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महाभारत के रचयिता वेदव्यास के विषय में कुछ ऐसे तथ्य जिन्हें कम लोग जानते हैं

Updated on 6 April, 2017 at 7:31 pm By

वेदव्यास ऐसे महान विद्वान थे, जिन्होंने मानवता के लिए विशाल काम किया। वह अपने समय के सबसे महान साहित्यकार थे। वह न केवल महाकाव्य महाभारत के रचयिता थे, बल्कि इसके एक पात्र भी थे।

जानकारों का मानना है कि विद्वान व्यास ने इस गाथा को अपने वास्तविक रूप में रखने के लिए सर्वश्रेष्ठ कार्य किया और साथ ही इसमें वेदो के ज्ञान का भी समावेश किया।

1. वह वेदव्यास ही थे, जिन्होंने महाभारत को पूर्ण विवरण के साथ इतिहास के रूप में प्रस्तुत किया।


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हिन्दू धर्मावलंबी महाभारत के दौरान और उससे पहले होने वाली घटनाओं के आधार पर इसे वास्तविक इतिहास मानते हैं।

2. भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र गणेश व्यास के वर्णनकर्ता थे।

वेदव्यास को यह श्रेय दिया जाता है कि उन्होंने गणेश को वर्णनकर्ता बनाकर अपने वैदिक ज्ञान को इस ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने वैदिक ज्ञान को आसानी से समझने के लिए इसे 4 अलग-अलग वेदों में विभाजित किया। आध्यात्मिक ज्ञान को आसानी से समझने के लिए थोड़े समय के अंतराल के बाद विभाजित किया जाता था। वेदव्यास ने वेदों को 28वीं बार बांटा।

3. वह त्रेता युग के अंत में पैदा होकर पूर्ण द्वापर युग और कलयुग के प्रारंभिक काल तक जीवित रहे थे।

4. वेदव्यास भगवान विष्णु के 18वें अवतार थे, जबकि भगवान राम 17वें अवतार थे।

बलराम और कृष्ण क्रमशः 19वें और 20वें अवतार थे। इन सब का वर्णन श्रीमद् भागवत में किया गया है जिसे वेदव्यास ने द्वापर युग के अंत में, महाभारत की रचना के तुरंत बाद लिखा था।

5. वेदव्यास नेपाल के तनहु जिले के दामौलि में पैदा हुए थे।

वह गुफा जहां उन्होंने महाभारत की रचना की थी, आज भी हिमालयी क्षेत्रों में स्थित है। नीचे दिखाया गया दृश्य नेपाल के तनहु जिले को दर्शाता है।

आगे दिखाए गए चित्र में नेपाल के दामौलि में व्यास की गुफा का दृश्य है।

6. वेदव्यास सत्यवती और महात्मा प्राशर की संतान थे।

युवावस्था में सत्यवती, भ्रमण करते हुए ऋषि पराशर को तब मिली थीं, जब वह नदी को पार कर रही थी। महात्मा पराशर ने सत्यवती को अपनी शारीरिक उत्तेजना को शांत करने की प्रार्थना की। सत्यवती इस शर्त के बाद सहमत हुई की उनका कौमार्य अखंड रहेगा और पूरे जीवन उनके शरीर की खुशबु कस्तूरी समान रहेगी।



7. वेदव्यास भीष्म के सौतेले भाई थे।

सत्यवती ने बाद में राजा शांतनु से शादी कर ली थी, जो भीष्म के पिता थे। सत्यवती और उसके पिता जो मछुआरों के प्रधान थे, ने शर्त रखी थी कि सत्यवती के पुत्रों को राजगद्दी विरासत में मिलेगी। तब राजा शांतनु भीष्म को राजकुमार और राजगद्दी का उत्तराधिकारी घोषित कर चुके थे। राजा शांतनु की पीड़ा को कम करने के लिए भीष्म ने सत्यवती की अन्य संतानों की सेवा करने का प्रण किया। उन्होंने कभी भी उस राजगद्दी पर कोई दावा नहीं किया जो उनकी थी।

8. वह धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर के आध्यात्मिक पिता थे।

अंततः सत्यवती के दो पुत्र पैदा हुए जो एक के बाद एक मृत्यु को प्राप्त हो गए। जब बड़े पुत्र विचित्रवीर्य का देहांत हुआ तो सत्यवती ने वेदव्यास से अम्बिका और अम्बालिका नाम की दो विधवाओं से नियोग करने को कहा।

नियोग एक प्राचीन हिन्दू धार्मिक रीति है, जिसमें उस अवस्था में जब उस महिला के पति की मृत्यु हो गई हो या वग संतानोत्पत्ति में असमर्थ हो, महिला के आग्रह पर उसके ऊपर भौतिक या आध्यात्मिक शक्ति केंद्रित करके गर्भवती किया जाता है, जिससे उसे बच्चा पैदा हो सके।

9. वेदव्यास का जन्मदिवस गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।

केवल वह ही ऐसे विद्वान हैं, जिन्हें वैदिक ज्ञान को पुराण, उपनिषद और महाभारत के रूप में द्वापर युग में लिखने का श्रेय जाता है। गुरु पूर्णिमा के दिन शिष्य अपने धार्मिक गुरुओं की उपासना करते हैं।

10. वेदव्यास का शाब्दिक अर्थ है ‘वेदों का विभाजन करने वाला’।

11. उन्हें सात चिरंजीवी (अमर या दीर्घायु) में से एक माना जाता है।

कलियुग के प्रारंभिक काल के बाद वेदव्यास का कोई ऐतिहासिक वर्णन नहीं मिलता। पर्वतों को ध्यान के लिए आश्रयस्थल के रूप में चुनने की उन्होंने ही शुरुआत की।

12.वेदव्यास का भगवान बुद्ध की दो जातक कथाओं कान्हा-दीपयाना और घटा में वर्णन है।


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प्रथम जातक कथा में उन्हें बोधिसत्व के रूप में वर्णित किया गया है, जिसमें उनके वैदिक कार्यों का वर्णन नहीं है और दूसरे में उन्हें महाभारत से नजदीकी रूप से जुड़ा हुआ कहा गया है।

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