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कश्मीरी पंडितों के पलायन से जुड़े ये 10 तथ्य आपको हैरान कर देंगे

Published on 1 July, 2016 at 1:58 am By

पिछले दिनों जब देश में ‘असहिष्णुता’ के मुद्दे पर टेलीविजन और प्रिंट मीडिया गुलजार था, उस समय तथाकथित बौद्धिक विमर्शों से हमारे जैसे ‘कमअक्ल’ भारतवासियों को भी संदेह होने लगा कि क्या सचमुच देश असंवेदनशीलता की आग में जल रहा है!

हालांकि, इस बीच कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों की संवेदनशीलता और सहिष्णुता की कलई भी खुल ही गई जब कश्मीर के पंडितों से वहां के स्थाई निवासी होने का प्रमाण मांगा जाने लगा।

कहा जा सकता है कि पिछले दो सालों में देश में कथित तौर पर फैले ‘इनटॉलरेंस’ पर जितना ‘बलवा’ मचाया गया, यदि उसका 1 फीसदी भी विगत 26 सालों से असहिष्णुता के दंश को चरम तक भोगने वाले कश्मीरी पंडितों के लिए भी किया जाता, तो शायद आज कश्मीर में पंडितों की वापसी का कम से कम विरोध तो नहीं होता।

आज कश्मीर में अलगाववादी भारत की संप्रभुता के ‘प्रतीक’ पंडितों के पुनर्वास पर सशस्त्र विरोध कर रहे हैं। बेहद दुःख की बात है कि इस विषय पर देश में कोई सार्थक बहस नहीं होती।



हाथ में स्मार्टफोन लेकर बड़ी हुई पीढी को शायद अपने ही देश में रिफ्यूजियों की तरह जिन्दगी बिताते कश्मीरी पंडितों की यथास्थिति के बारे में पता नहीं है। आज हम आपको घाटी से पलायन कर गए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचारों के तथ्यों से अवगत कराएंगे।

1. अंग्रेजों से सत्ता के हस्तांतरण के पश्चात कश्मीर को पूर्व के स्विट्जरलैंड के रूप में विकसित करने के उद्देश्य से डोगरा वंश के अंतिम शासक महाराजा हरी सिंह ने इसे भारत संघ में शामिल होने देने से इनकार कर दिया। इसका फायदा उठाते हुए पाकिस्तान ने कबीलाइयों की मदद से कश्मीर का पश्चिमी हिस्सा हड़प लिया।

2. भारत संघ में विलय होने के बाद कश्मीर में भारतीय फौजों की तैनाती के बाद, पकिस्तान के हौंसले पस्त होने लगे। उसके बाद लगातार 3 युद्धों में भारत द्वारा रौंदे जाने से बौखलाए पाकिस्तान POK(पाक अधिकृत कश्मीर) का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों यथा अलगाववादियों को संरक्षण देने और घुसपैठ में करने लगा।

3. 90 के दशक के अंतिम वर्षों में एक बार फिर पाक समर्थक अलगाववादियों ने घाटी क्षेत्र में भारत विरोधी सशस्त्र आन्दोलन की शुरुआत की और स्थानीय रहवासियों से भारत के खिलाफ होने की अपील की। इसका घाटी के हिन्दुओं(विशेषकर सारस्वत पंडितों) ने विरोध किया।

4. पाकिस्तान भारत के सामरिक कौशल से पूरी तरह परिचित था। उसे पता था कि सीधे तरीके से कश्मीर को भारत से अलग नहीं किया जा सकता। इसलिए वह अपने उदयकाल से ही कश्मीर की एकता को खंडित करने के प्रयास में जुटा हुआ था। लगातार 40 वर्षों तक पाकिस्तान द्वारा कश्मीर में धार्मिक कट्टरपंथ को बढ़ावा देने के परिणामस्वरुप घाटी के अलगाववाद से प्रेरित बहुसंख्यक मुसलमानों (सभी नहीं) ने पाक का समर्थन करते हुए, हिन्दुओं को भारत का प्रतिनिधि घोषित करते हुए कत्लेआम करना शुरू कर दिया।

5. हिन्दू पंडितों के घरों को जला दिया गया। माताओं और बहनों के साथ दुराचार कर उन्हें धर्मान्तरण के लिए मजबूर किया गया। पंडितों के घरों में फरमान चिपकाया गया कि वे “घाटी छोड़ कर चले जाएं, अन्यथा उन्हें जिन्दा जला दिया जाएगा”। मंदिरों को बुरी तरह निशाना बनाया गया। नई दिल्ली के राजनीतिक स्वार्थ और अस्थिरता के कारण कश्मीरी पंडितों के हित में कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। फलत: कश्मीरी पंडितों को अपने घर और जमीनों को छोड़कर भागना पड़ा। आज भी कई कश्मीरी पंडितों के परिवार शरणार्थी कैंपों के भरोसे जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

6. सर्वानंद कौल, जस्टिस नीलकंठ गंजू और पं टीका लाल टपलू सरीखी घाटी की प्रमुख हिन्दू शख्सियतों की निर्मम हत्याएं कर दी गईं। कश्मीरी पंडितों के संगठन ‘पनुन’ की मानें तो 400 से अधिक पंडित अकेले 1990 में ही मौत के घाट उतार दिए गए।

7. लगभग चार से पांच लाख कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया गया। दुखद है कि उस वक़्त उनके हितों की रक्षा करने वाला कोई नहीं था। सौ करोड़ की आबादी वाला हिंदुस्तान कश्मीरी पंडितों की एक पूरी पीढी की बर्बादी तमाशबीन बन देखता रहा।

8. मानवाधिकारों की वकालत करने वाले यूनाइटेड नेशन जैसे संगठनों ने इसे ‘नरसंहार’ की श्रेणी में रखना भी मुनासिब नहीं समझा। सरकारें बदलती गईं पर पंडितों की हालत जस की तस रही। उल्टा अलगाववादियों ने सरकार में भागीदारी करते हुए, कश्मीरी पंडितों का जम कर शोषण किया।

9. राज्य ही नहीं केंद्र सरकारें भी पंडितों के अधिकारों के प्रति उदासीन रहीं। खून बहाने वाले अलगाववादी खुले मंच से भारत को गाली देते रहे। ऐसी विकट परिस्थितियों में सरकारों द्वारा कश्मीरी पंडितों को बाकी अल्पसंख्यकों की भांति किसी भी तरह का आरक्षण और सुविधाएं प्रदान नहीं की गईं।

10. महर्षि कश्यप जिनके नाम पर कश्मीर का नामकरण किया गया, के वंशजोंं को उन्हीं की भूमि से खदेड़ दिया गया। भारत जहां हर दूसरे केस में जांच के लिए आयोग बनाया जाता है, वहां पंडितों की दुर्दशा का आकलन करने के लिए, पिछले 26 सालों में एक भी न्यायिक आयोग गठित नहीं किया गया। मानवाधिकार संगठनों ने तो इसे ‘जातिसंहार’ मानने से भी इंकार कर दिया।

आधुनिक भारत के इतिहास में विभाजन के बाद ‘कश्मीर त्रासदी’ सबसे कड़वा अध्याय रहा है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में लब्धप्रतिष्ठित भारत के मुकुटमणि कश्मीर में ही उसके नागरिकों का ‘मूलभूत अधिकारों’ से इतने लम्बे समय तक वंचित रहना बेहद शर्मनाक है।


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धारा-370 का निरसन इस समस्या के समाधान का एक दूसरा पहलू है जो कि राजनीतिक क्लिष्टता से युक्त हैं परन्तु एक सामजिक पहलू भी है जो कि इन कश्मीरी पंडितों के जख्मों पर मरहम लगा सकता हैं।

देश को ‘इनटॉलरेंट’ सिद्ध करने वाले विचारकों से भी करबद्ध निवेदन है कि वे अपनी सहिष्णुता और संवेदनाशीलता को पक्षपाती बना कर न रखें।

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