26/11 मुंबई हमले में इस हीरो ने सीने पर खाई थी गोली, अब मैराथन में जीता पदक

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Updated on 15 Sep, 2017 at 2:31 pm

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“लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती
हिम्मत करने वालों की कभी हार नही होती”

हरिवंश राय बच्चन द्वारा लिखी गई ये पंक्तियां उन लोगों के हौसले की कहानी को बयां करती हैं, जिनकी हिम्मत के आगे हर प्रतिकूल परिस्थिति नतमस्तक हो गई। यहां हम आपको जिस शख्स की गाथा से रूबरू कराने जा रहे हैं, उनकी बहादुरी और बेमिसाल जज्बे को आप भी सलाम करेंगे।

वर्ष 2008 में 26/11 के मुंबई आतंकी हमले में कई लोगों ने अपनी जान गंवाई। देश के कई वीर जवान शहीद हो गए। जवानों ने आतंकियों से डटकर लोहा लिया। कई जवान बुरी तरह घायल हो गए। इन्ही में से एक हैं मुंबई आतंकी हमले के दौरान बुरी तरह से घायल होने के बावजूद आतंकियों को नेस्तनाबूत करने वाले भारत के वीर सपूत प्रवीण तेवतिया।

पूर्व मरीन कमांडो और शौर्य चक्र विजेता 32 वर्षीय प्रवीण तेवतिया ने ताज होटल में आतंकियों का डटकर मुकाबला किया था।

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दरअसल, 26 नवंबर 2008 को जब ताज होटल में आतंकी हमला हुआ, एक कमरे में तीन आतंकी छुपे हुए थे। जैसे ही प्रवीण कमरे में घुसे, आतंकियों ने उनपर ताबड़तोड़ गोलीबारी करनी शुरू कर दी। इस फायरिंग में एक गोली उनके सीने और दूसरी गोली उनके कान के बगल से चीरती हुई निकली। गोली लगने के बाद प्रवीण ने हिम्मत नहीं हारी और आतंकियों को उनके नापाक मंसूबे में कामयाब नहीं होने दिया। उन्होंने तीनों आतंकियों को अकेले ही मौत के घाट उतार दिया। उनकी इस बहादुरी के लिए उन्हें शौर्य चक्र से नवाजा गया।

करीबन पांच महीनों तक अस्पताल में उनका इलाज चला। डॉक्टरों ने सारी उम्मीदें छोड़ दी थी, लेकिन पांच महीने के कड़े संघर्ष के बाद वह ठीक हुए। हालांकि, कान के पास गोली लगने की वजह से उनकी सुनने की क्षमता प्रभावित हुई। गोली लगने के बाद प्रवीण आंशिक तौर बधिर हो गए। नेवी में कार्यरत इस कमांडो को फिर नॉन-एक्टिव ड्यूटी दे दी गई, लेकिन प्रवीण डेस्क जॉब नहीं करना चाहते थे। इसके बाद उन्होंने खुद को फिट साबित करने के लिए कई मैराथनों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया।

उनकी अथक मेहनत रंग लाती रही। इस कड़ी में प्रवीण ने 9 सितंबर को लद्दाख में आयोजित 72 किलोमीटर लंबे खारदुंग ला मैराथन में हिस्सा लिया और मैराथन को निर्धारित समय में पूरा कर पदक अपने नाम किया है।

प्रवीण ने 18,380 फीट की ऊंचाई पर 12.5 घंटे में मैराथन की दौड़ पूरी कर यह पदक जीता है।

प्रवीण ने 2014 में मैराथन की ट्रेनिंग लेनी शुरू की। उन्होंने मुंबई मैराथन और 2016 में इंडियन नेवी हाफ मैराथन में भी हिस्सा लिया। इसके अलावा प्रवीण ने 1.9 किलोमीटर की तैराकी, 90 किलोमीटर साइक्लिंग और 21 किलोमीटर दौड़ में भी हिस्सा ले चुके हैं।

इन सबके के बावजूद उनकी फिटनेस को लेकर नेवी संतुष्ट नहीं हुई और उन्हें आखिर में  स्वैच्छिक रिटायरमेंट लेना पड़ा। प्रवीण बताते हैंः

“नेवी को मेरे फिटनेस पर यकीन नहीं हुआ। मैं मैराथन के लिए ज्यादा छुट्टियां नहीं ले सकता था। फिर मैंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। मुझे किसी बात को लेकर कोई गिला नहीं है। उन्होंने (नौसेना) किताब के अनुसार काम किया और मैं एक जूनियर रैंक का अधिकारी था, लेकिन मैं चाहता था कि हर कोई यह जाने कि मैं वही आदमी हूं जिसने ताज होटल में बतौर कमांडो हिस्सा लिया था। मैं खुद को भूलने नहीं देना चाहता था।”

प्रवीण ने लद्दाख में आयोजित जिस मैराथन को पूरा किया वह अच्छे से अच्छे शख्स के लिए कर पाना आसान नहीं है। वहां ऑक्सीजन की मात्रा काफी कम होती है और अगर किसी का फेफड़ा पहले से ही क्षतिग्रस्त हो तो, उसके लिए तो यह काम किसी चुनौती से कम नहीं है।

प्रवीण का ऐसा करना बड़ी उपलब्धि है। ये उनकी मजबूत इच्छाशक्ति का ही परिणाम है कि उन्होंने इस कठिन मैराथन को निर्धारित समय में पूरा कर कीर्तिमान स्थापित किया है। ऐसे बेजोड़ जज्बे को हमारा सलाम।


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