विकट परिस्थितियों का बहादुरी से सामना करने वाला ही योद्धा कहलाता है

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Updated on 29 Jun, 2017 at 9:37 pm

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किसी ने सही कहा है, जहां चाह है, वहां राह है। जिंदगी के इस फलसफे में उतार-चढ़ाव बने रहते हैं। कभी-कभी ऐसी अनचाही परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, जिसकी उम्मीद नहीं होती। ऐसे में वही शख्स योद्धा कहलाता है, जो उन विकट परिस्थितियों में घबराता नहीं और उनका सामना करता है। दुनियाभर में कई ऐसे लोग हैं जो आगे बढ़कर उन चुनौतियों का सामना करते हैं और अपने सपनों को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। अपनी मजबूत इच्छा शक्ति और दृढ़ संकल्प के साथ वह नामुमकिन को मुमकिन करने का माद्दा रखते हैं। आगे जिंदगी में क्या होगा, इसकी फिक्र किए बिना, कुछ लोग बिना किसी डर के हर बाधा को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ते हैं।

यहां हम आपको भारतीय सेना के एक पूर्व जवान की कहानी बताने जा रहे हैं, जिन्होंने सेना में 17 साल अपनी सेवाएं दी। उनकी जीवनगाथा हर किसी के लिए प्रेरणास्रोत है। दो बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने पप्पू सिंह आज की पीढ़ी के लिए बहादुरी, कड़ी मेहनत का बेहतरीन उदाहरण हैं।

2007 में एक ट्रेन एक्सीडेंट में अपना बायां पैर गंवा चुके पप्पू सिंह आज दिव्यांगों के लिए प्रेरणा हैं। उनका एक पैर नहीं है तो क्या, यह रिटायर्ड जवान दो पैरों पर चलने वाले अच्छे से अच्छे खिलाड़ी को पराजित करने में माहिर हैं। जिस दिव्यांगता को दूसरे लोग उनकी कमजोरी मानते रहे, उसे उन्होंने अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया। वह पिस्टल शूटिंग में राष्ट्रीय चैंपियन रहे हैं और राजस्थान वॉलीबॉल टीम के कप्तान भी हैं।

pappu singh

उनकी जिंदगी में एक वक्त ऐसा भी आया जब वह हर उम्मीद छोड़ चुके थे। लेकिन उनमें कभी न हार मैंने वाला वो जज्बा था, जिसने उन्हें हमेशा कुछ करने के लिए प्रोत्साहित किया। इसके बाद उन्होंने कई विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेना शुरू किया। इन्ही प्रतियोगिताओ में से एक थी निःशक्त कल्याण समिति के अंतर्गत आयोजित दिव्य खेल प्रतिष्ठान फेस्टिवल।  इस फेस्टिवल में वॉलीबॉल, निशानेबाजी और सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। इस फेस्टिवल का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर दिव्यांगों को अवसर प्रदान करना है।


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इस फेस्टिवल में पप्पू सिंह ने अपनी राजस्थान पैरा वॉलीबॉल टीम का प्रतिनिधत्व कर, वहां मौजूद तमाम लोगों का दिल जीत लिया। वह सभी के लिए आकर्षण का केंद्र बन गए।



पप्पू सिंह ने अपनी कमजोरी को अपना हथियार बनाया और वॉलीबॉल प्रतियोगिता में दो बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। सिंह 1985 से मैच खेल रहे हैं। 1988 में वह सेना में शामिल हुए और बाद में 45 देशों में भारत का नेतृत्व किया।

2004 में रिटायर्ड हुए पप्पू सिंह ने दुर्घटना में अपना बायां पैर गंवाने के बाद, जिंदगी से हार नहीं मानी और अपनी जिंदगी को आगे कैसे बेहतर बनाया जाए इसके लिए प्रयास करने शुरू कर दिए। पप्पू सिंह कहते हैं :

“पिस्टल शूटिंग, एथलेटिक्स, स्वीमिंग, ताइक्वांडो, बैडमिंटन और पावर लिफ्टिंग जैसे कई इवेंट हैं, जिनमें भाग लेकर दिव्यांग अपने आपको साबित कर सकते हैं। बस उन्हें ये पता होना चाहिए कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं। हम सबके अंदर एक हुनर छिपा है, बस इससे पहचानने की ज़रूरत है।”

इसके इलावा, पप्पू सिंह को बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व तत्कालीन रेलमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव के हाथों डबल गोल्ड का पुरस्कार मिला हुआ है। सेना के इस पूर्व जवान की जीवनगाथा वाकई प्रेरणादायक है और हर उस शख्स के लिए एक सीख है जो अपने सपनों को पूरा करने की हिम्मत रखते हैं।

यह कहानी हमें एलेनोर रूजवेल्ट की इन पंक्तियों की याद दिलाती है- “भविष्य उनका है जो अपने सपनों की खूबसूरती में विश्वास करते हैं।”


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