दीपों का त्योहार है दीपावली, फिर ये पटाखे बीच में कहां से आ गए!

Updated on 8 Nov, 2018 at 1:25 pm

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दिवाली के मौके पर पटाखों की बिक्री पर लगा बैन सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ हटा लिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा इस बार दिवाली में ग्रीन पटाखों (कम प्रदूषण फैलाने वाले पटाखे) को ही इस्तेमाल किया जाएगा। रात 8 बजे से 10 बजे के बीच ये पटाखे जलाए जा सकेंगे। क्रिसमस और नए साल के मौकों पर ये समय एक घंटे का है, ये समय रात के 11.45 से लेकर 12.45 के बीच होगा।

 

 


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भारत में पटाखों से होने वाली सांस संबंधी बीमारियों से कई लोग परेशान हैं। पटाखों का असर सिर्फ़ बच्चों पर ही नहीं, बल्कि बड़े बुज़ुर्गों पर भी होता है, लिहाज़ा बहुत से लोग सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से काफ़ी खुश नज़र आए, जबकि कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्हें ये फ़ैसला सही नहीं लगा। ऐसे में ये सवाल उठना लाज़मी है आखिर दिवाली ओर पटाखों के बीच क्या संबंध है।

 

पटाखों और आतिशबाज़ी के इतिहास से जुड़ा एक सवाल मन में ये उठता है आखिर इसकी शुरुआत कब और कैसे हुई। क्या भारत में आतिशबाज़ी को लेकर कोई पुरानी परंपरा रही है ? प्राचीन इतिहास तो ऐसा बिलकुल नहीं कहता।

 



दीपावली का शाब्दिक अर्थ देखें तो दीप और आली से दीपावली बना। दीप यानी दिया और आली यानी पंक्ती। दीयों की पंक्ति को ही दीपावली कहा गया। फिर ये पटाखों का शोर कहां से दिवाली पर गूंजने लगा।

प्राचीन काल में खुशियां और उल्लास मनाने के लिए घर द्वार पर रोशनी जरूर की जाती थी, लेकिन इस रोशनी में कहीं भी पटाखों का जिक्र नहीं मिलता। लोग घर में घी के दिए जलाकर खुशी मनाते थे। इतिहास में इस बात का भी ज़िक्र है जब 1526 में काबुल के सुल्तान बाबर ने मुगल सेना के साथ मिल कर दिल्ली पर हमला किया तो उसकी बारूदी तोपों की आवाजों से भारतीय सेनिकों के दिल दहल गए। क्योंकि इससे पहले उन्होंने कभी भी ऐसी आवाजें नहीं सुनी थी, इस बात से साफ़ ज़ाहिर होता है भारत में कभी पटाखे चलाए ही नहीं गए थे।

 

 

पटाखों को लेकर इतिहास में दो मत है। कुछ इतिहासकार मानते हैं भारत में पटाखों की शुरुआत मुगलों के आने के बाद शुरु हुई, जबकि कुछ का मानना है पटाखे भारत में मुगलों के आने से पहले ही चलाए जाते थे, जिसका इस्तेमाल खासतौर पर शिकार के लिए किया जाता था।


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