जानबूझकर पहाड़ी से गिराई गई थी ढोलकल गणेश प्रतिमा, भारतीय संस्कृति की योजनाबद्ध हत्या की साजिश

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Updated on 29 Jan, 2017 at 11:35 am

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छत्तीसगढ़ के बस्तर में ढोलकल गणेश प्रतिमा को ऊंची पहाड़ी से जानबूझकर नीचे गिराया गया था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पहले तो मूर्ति को खंडित करने के लिए इस पर हथौड़े से प्रहार किया गया। लेकिन जब यह मूर्ति नहीं टूटी तो इसे लोहे के रॉड से फंसाकर पहाड़ी से नीचे गिरा दिया गया। मूर्ति के 56 टुकड़े हुए है। हालांकि, ऐसा कोई महत्वपूर्ण भाग गायब नहीं हुआ है जिससे मूर्ति का मूल रूप प्रभावित हो। कहा गया है कि यह प्रतिमा 85 फीसदी बची हुई है।

ढोलकल गणेश प्रतिमा को खंडित किया जाना इस का प्रमाण है कि भारतीय संस्कृति की योजनाबद्ध हत्या की साजिश रची जा रही है। भगवान गजानन की यह प्रतिमा करीब 12 सौ साल से अधिक समय से दक्षिण बस्तर के इस पहाड़ी पर स्थित थी। उसे जान-बूझ कर तोड़ा गया। हालांकि, इसमें किसका हाथ है, इस पर संशय नहीं है। यह क्षेत्र माओवादियों के अभयारण्य के रूप में जाना जाता है। साथ ही यहां की आदिवासी आबादी पर ईसाई मिशनरियों का प्रभाव भी काफी हद तक है।

दंतेवाड़ा से करीब 24 किलोमीटर दूर बैलाडीला की एक पहाड़ी का नाम ढोलकल है। इस पहाड़ी का शिखर समुद्र तल से 2994 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। गणेश प्रतिमा इसी शिखर पर विराजमान रही थी।


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इस क्षेत्र में प्रचलित मान्यता है कि इसी शिखर पर भगवान गणेश और परशुराम का युद्ध हुआ था। युद्ध के दौरान भगवान गणेश का एक दांत यहां टूट गया। इस घटना को इतिहास का हिस्सा बनाने के लिए लिहाज से छिंदक नागवंशी राजाओं ने शिखर पर गणेश की प्रतिमा स्थापति की। चूंकि परशुराम के फरसे से गणेश का दांत टूटा था, इसलिए पहाड़ी की शिखर के नीचे के गांव का नाम फरसपाल रखा। यहां के स्थानीय आदिवासियों का मानना है कि वे ढोलकट्टा नामक महिला पुजारी की संतान हैं, जिन्हें गणेश प्रतिमा के पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी गई थी।

फिलहाल दंतेवाड़ा क्षेत्र में भारतीय सांस्कृतिक धरोहर मूर्तियों के संरक्षण पर सवाल खडे़ किए जा रहे हैं।

इनके संरक्षण की जिम्मेदारी न केवल पुरातत्व विभाग की है, बल्कि पर्यटन और संस्कृति विभाग की भी है। आरोप हैं कि इन विभागों की बैठक होती है, लेकिन धरातल पर कोई काम नहीं होता।

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