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डिग्री को लेकर इतना बवाल क्यों, आलोचना नीतियों और उपलब्धियों की क्यों नहीं होती?

Published on 21 May, 2016 at 8:36 pm By

आजकल मेरे इंजीनियरिंग दोस्त बहुत खुश हैं। उनके पास रोज़गार भले ही न हो, पर ऐसा कुछ ज़रूर है, जिसकी वजह से वे फूले नही समा रहे। पहले जहां उनका काम नात-रिश्तेदारों से आलोचना सुनने से लेकर, घर के ज़रूरी कार्य जैसे अंडे, दूध वग़ैरह लाना था। वहीं आजकल राजनैतिक मुद्दों ने कम से कम उन्हें यह सम्मान तो दिला ही दिया है कि वे आराम से घर पर बैठ कर पॉपकॉर्न के साथ आइपीएल का मज़ा उठा सकते हैं। दरअसल, उनके पास डिग्री है। वही डिग्री जिसकी ‘थर्ड डिग्री’ के चर्चे चाय की दुकान से लेकर पीएमओ तक है।


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आजकल अपने देश में जो डिग्री को लेकर दीवानापन है, उसका मैं शायद सबसे बड़ा प्रशंसक हूं। भले ही आजकल ताप-मान 45 ‘डिग्री’ सेल्शियस पार कर गया हो। महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्यों में लगभग 60 फीसदी इलाक़ों को सूखा प्रभावित घोषित कर दिया गया हो। पर आजकल राजनैतिक पार्टियों के पास इस  ‘प्रचंड डिग्री’ से उत्पन्न हो रही समस्याओं पर मुद्दे से ज़्यादा, उस ‘थर्ड डिग्री’ का मुद्दा सम्माननीय है। और यह होना भी चाहिए जैसे मेरे बेरोज़गार इंजीनियरिंग दोस्तों के लिए है।

तो चलिए इनसे मिलते हैं ये हैं आलोक सागर

आलोक सागर 25 सालों से गरीब आदिवासियों के बीच रह रहे हैं। हालांकि, बड़े बाल, बढ़ी हुई दाढ़ी, पुराना ख़स्ताहाल झोला पैरों में गाडिय़ों के टायरों की बनी हुई चप्पल, रहने के लिए एक जर्जर झोपड़ी और चलने के लिए साइकल। इनकी यह रूपरेखा आपको भ्रमित कर सकती है। आपके हिसाब से ये हुलिया ज़रूर किसी कबीलाई आदिवासी का होगा, जिसकी शैक्षिक योग्यता न के बराबर होगी, लेकिन ऐसा नहीं है। यह हुलिया आईआईटी दिल्ली के एक प्रोफेसर आलोक सागर का है । जिन्होने आईआईटी दिल्ली में इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग करने के साथ ही विदेश में पढ़ाई कर डिग्रियां हासिल की हैं। इसके बाद आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर बन गए। आरबीआई के गवर्नर रघुराज राजन जैसी कई ख्याति प्राप्त हस्तियां आलोक से पढ़ चुकीं हैं । फिलहाल, आलोक आदिवासियों की जिंदगी बेहतर बनाने के लिए अपनी ज़िंदगी एक गुमनाम तरीके से जी रहे हैं।

आलोक ने डिग्रियों को फ्रेम में करा कर घर के ड्रॉयिंग रूम में टांगने की हमारी भारतीय प्रथा को तोड़ा है । जहां देश का हर राजनैतिक दल आम जनता के साथ ‘डिग्री दिखाओ’ आंदोलन में सक्रिय दिख रहा है । वहीं, आलोक सागर ने आईआईटी दिल्ली की इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग की डिग्री के साथ अमेरिका के हयूस्टन यूनिवर्सिटी टेक्सास से शोध डिग्री, टेक्सास यूनिवर्सिटी से डेंटल ब्रांच में पोस्ट डॉक्टरेट और समाजशास्त्र विभाग, डलहौजी यूनिवर्सिटी, कनाडा में फेलोशिप इत्यादि की डिग्रियां उठा कर एक अर्से पहले संदूक में बंद कर दी।

ज़ाहिर है यह प्रश्न भी ज़हन में उठ रहा होगा कि इतनी डिग्रियां होने के बावजूद आलोक सागर ऐसी गुमनाम ज़िंदगी क्यों जी रहे हैं!

जवाब सीधा सा है कि काबिलियत काम करने के तरीके से नापा जाना चाहिए। डिग्रियों के गट्ठर के वजन से नहीं। यह बात हम आप समझते हैं, शायद राजनैतिक पार्टियां नहीं। पर आज नहीं तो कल धीरे-धीरे ही सही, यह बात उन्हें भी समझ में आ ही जाएगी।

मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में आलोक सागर आदिवासियों के साथ सादगी भरा जीवन बिता रहे हैं। उनका सपना है कि गरीब आदिवासियों को जिंदगी बदलने का तरीका सीखा सकें । वे आदिवासियों के सामाजिक, आर्थिक और अधिकारों की लड़ाई लड़ते हैं। आदिवासी बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के साथ-साथ उनको ग़रीबी से लड़ने के तरीके बताते हैं । आलोक ग्रामीणों के साथ मिल कर लीची, अंजीर, नीबू, मौसंबी, संतरा, रीठा, आम, महुआ आदि के हज़ारों पेड़ लगा चुके हैं। जिनसे अब उन आदिवासियों की जीविका चलती है।

शिक्षा ज़रूरी है और मेरा मानना है कि इसे हर इंसान तक पहुंचना भी चाहिए। समाज के विकास के लिए पढ़ा-लिखा होना ज़रूरी है। लेकिन मैं इस बात के भी खिलाफ हूं कि किसी की योग्यता या काबीलियत मापने के लिए डिग्री ही एकमात्र शर्त हो। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र देश भारत में एक आम व्यक्ति प्रधानमंत्री बनता है। आज वह दुनियां के दस ताकतवर लोगों में शुमार है। मेरे समझ से परे हैं कि उसकी आलोचना और समीक्षा उसकी डिग्री को लेकर क्यों है? आलोचना और समीक्षा तो प्रधानमंत्री के बयानों की होनी चाहिए उनकी नीतियों की होनी चाहिए।



सोचिए अगर कल सचिन को क्रिकेट का भगवान कहने पर सिर्फ़ इसलिए विरोध करने लगें क्योंकि सचिन बारहवीं मे 6 नंबर से फेल हुए थे। या मार्क जकरबर्ग और स्टीव जॉब्स की काबीलियत सिर्फ़ इसलिए कम आंकी जाए, क्योंकि उन्होंने बीए नहीं किया, तो आपको नहीं लगता उपलब्धि की परिभाषा बदल जाएगी।

खैर जो भी हो, किसी ने सही ही कहा है राजनीति मुद्दों पर ही जीवित है। पर मेरा मानना है कि मुद्दे भी वही होने चाहिएं, जिने समाज कल्याण हो, देश का विकास हो। आज डिग्री मांगी जा रही है। कल वो पुराना बस्ता भी मांगा जा सकता है कि प्रमाणित करिए की आपने डिग्री स्कूल जा कर ही प्राप्त की है। फिर किसी दिन वह घिसी हुई पेन्सिल भी दिखाने को कहा जा सकता कि हां भाई यह सबूत के तौर पर पेश कीजिए कि परीक्षा आपने ही दी थी।

वैसे मुद्दों का क्या। मुद्दे तो आते-जाते रहते हैं, फिलहाल मैने कई अलमीरा छानने के बाद अपनी डिग्रियां खोज ली हैं। संभाल के दीवारों पर टांग दी हैं। आप भी टांग दीजिए और उसे देख-देख कर मेरी ही तरह मुस्कुराईए। अगर आपके पास कोई डिग्री नही है, तो शर्मिंदा मत होइए। आज हमारे देश के हर गली में एक संस्थान या स्कूल मिल ही जाएगा, जो आपकी ‘योग्यता की डिग्री’  उपलब्ध करा ही देगा ।

 

 

 

 


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