महिलाएं ही नहीं पुरुष भी होते हैं प्रताड़ित, इस महिला ने पुरुषों पर अत्याचार के खिलाफ उठाई आवाज

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Updated on 27 Jan, 2017 at 9:31 pm

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भारत में जहां महिलाओं पर अपराध के मामलों की खबर आए दिन आती है, वहीं एक महिला पुरुषों पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ उनकी आवाज बनकर खड़ी है। जी हां, आपने बिलकुल ठीक पढ़ा।

भारत में जहां हर 15 मिनट में एक बलात्कार की घटना दर्ज होती है। हर पांचवें मिनट में घरेलू हिंसा का एक मामला सामने आता है। हर 69वें मिनट में दहेज के लिए दुल्हन की हत्या होती है और हर साल हजारों की संख्या में बेटियां पैदा होने से पहले ही गर्भ में मार दी जाती हैं। ऐसे में लड़कियों की आवाज बनकर कई सामाजिक कार्यकर्ता उनके हित में खड़े हैं। लेकिन सवाल उठता है कि क्या सिर्फ महिलाएं ही प्रताड़ना का शिकार होती हैं?

कभी-कभी कई महिलाएं अपनी सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों का दुरूपयोग भी करती हैं। पुरुषों को प्रताड़ित करती हैं। ऐसे पुरुषों के हक में आवाज बुलंद कर रहीं हैं 31 वर्षीया दीपिका नारायण भारद्धाज।

डॉक्युमेंट्री फिल्ममेकर दीपिका का मानना है कि पुरुष भी घरेलू हिंसा का शिकार होते हैं। कई ऐसे हैं जिन्हें मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया जाता है। दीपिका ने कई ऐसे सवाल उठाए हैं जो तार्किक तौर पर सही भी हैं। दीपिका पूछती हैंः

“क्या मर्द असुरक्षित नहीं हैं? क्या उन्हें भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता? क्या वे पीड़ित नहीं हो सकते?”


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दीपिका भारतीय दंड संहिता यानी IPC की धारा 498ए (दहेज कानून) के दुरुपयोग के खिलाफ अपनी लड़ाई लड़ रही हैं। इस कानून का उद्देश्य महिलाओं को दहेज की कुप्रथा से बचाने का है, लेकिन कई महिलाएं इसका दुरुपयोग भी कर रही हैं। ऐसे में दीपिका देशभर में ऐसे मामलों की पड़ताल कर रही हैं, जहां इस तरह के कानून का दुरुपयोग किया गया हो। वह इस मुद्दे को लेकर एक डॉक्यूमेंट्री भी बना रही हैं, जिसका नाम है ‘मार्टियर्स ऑफ मैरिज’।

पुरुषों के साथ खड़ी दीपिका बताती हैंः

“जिस तरह महिलाओं की लड़ाई लड़ने के लिए महिला होना जरूरी नहीं है, उसी तरह मर्दों के लिए लड़ने के लिए मर्द होना आवश्यक नहीं है। मैं महिला अत्याचारों की बात इसलिए नहीं करती, क्योंकि उनकी बात करने वाले लाखों की संख्या में हैं।”

पत्रकार रह चुकी दीपिका ने साल 2012 में पुरुषों के हक में अपनी लड़ाई तब शुरू की, जब उनके परिवार को भी एक ऐसी ही स्थिति से गुजरना पड़ा। उस घटना का जिक्र करते हुए दीपिका ने बतायाः

“साल 2011 में मेरे चचेरे भाई की शादी तीन महीने में टूट गई और उसकी पत्नी ने भाई और हमारे पूरे परिवार पर मारपीट करने और दहेज मांगने का आरोप लगाया। उसने हमारे खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज कराया। मुझे भी अभियुक्त बनाया गया और आरोप लगाया गया कि मैं भी उसे नियमित तौर पर मारा-पीटा करती थी।”

इसी एक घटना ने उन्हें  498ए के खिलाफ खड़ा होने के लिए प्रेरित किया। उनका मकसद ऐसे कानून के दुरुपयोग होने से रोकना है।



दीपिका कहती हैं कि यह कानून के लाने के पीछे उद्देश्य तो अच्छा था, लेकिन जो कानून जिंदगी बचाने के लिए लाया गया था, अब उसका दुरुपयोग कई निर्दोष लोगों की जिंदगियां ले रहा है।

चार साल में बनी इस डाक्यूमेंट्री के जरिए दीपिका ने इस कानून के गलत इस्तेमाल से जूझ रहे ‘पीड़ितों’ की दास्तां को समाज के सामने रखा है। ऐसे पति जिनपर दहेज विरोधी कानून के तहत गलत आरोप लगाए गए और फिर कई साल जेल में काटने पर कोर्ट ने निर्दोष करार दिया। डाक्यूमेंट्री के जरिए ऐसे माता-पिता के दर्द को बताया गया है जिनके बेटों ने समाज में बदनामी के डर से खुदखुशी कर ली। दीपिका कहती हैं-

“आप इसे केवल यह कहकर खारिज नहीं कर सकते कि ऐसे मामले गिने-चुने हैं। पिछले कुछ वर्षों में कई हज़ार लोगों ने मुझसे मदद मांगी हैं। मुझे बताया गया है कि महिलाओं की हेल्पलाइन पर आने वाले 24 फ़ीसद कॉल्स पुरुषों के होते हैं। ज़िंदगियां बर्बाद हो रही हैं और लोग खुद को मार रहे हैं।”

दहेज उत्पीड़न ही नहीं पिछले कुछ समय से बलात्कार के भी कई झूठे मामले दर्ज किए गए हैं। दिल्ली महिला आयोग ने खुद कहा है कि अप्रैल 2013 से जुलाई 2014 के बीच दर्ज रेप के कुल मामलों में से 53.2 प्रतिशत झूठे पाए गए। यहां तक की सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ मौकों पर इस कानून के दुरुपयोग को लेकर अपनी चिंता जाहिर की है।

2012 में निर्भया कांड के बाद कानून को और सख्त बना दिया गया है, लेकिन कई महिलाओं ने इनका भी गलत उपयोग कर निर्दोष पुरुषों को फंसाने की कोशिश की है। ऐसे में दीपिका ऐसे लोगों के लिए भी अपनी लड़ाई लड़ रही हैं।

पुरुषों के साथ हो रही प्रताड़ना के विरोध में खड़ी दीपिका को कई बार विरोध का सामना भी करना पड़ा है। कई उन्हें महिला विरोधी कहते हैं, लेकिन दीपिका इन सब बातों से बेफिक्र होकर अपने नेक अभियान में डटी हुई हैं।

दीपिका कहती हैंः

“कुछ नारीवादियों को लगता है कि मेरा पुरुषों के हित में खड़ा होना राजनितिक तौर पर गलत है। लेकिन मैं किसी के जेंडर के बारे में सोचे बिना सबके साथ न्याय चाहती हूं। मैं जो कर रही हूं वो महिलाओं के खिलाफ़ नहीं है, मेरा काम अन्याय के खिलाफ है।”

स्रोत: BBC


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