पितरों की तस्वीर पूजा घर में लगाना आखिर क्यों होता है अशुभ?

Updated on 9 Sep, 2017 at 4:08 pm

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आमतौर पर हम अपनी परंपरा को लेकर खासे संजीदे होते हैं। परम्पराओं का पालन और कर्तव्य निर्वहन की शिक्षा घर से ही मिलती है। पर्व-त्योहार और उत्सव के साथ-साथ दिनचर्या में भी धार्मिक परम्पराओं का पालन हम बचपन से सीखते हैं। अमूमन लोग दिन की शुरुआत साफ़-सफाई और पूजा-पाठ से करते हैं। लाजिमी है कि घर में भी पूजाघर या पूजास्थल होता है।

हिन्दुओं में मृत पूर्वज और परिजनों को पितर कहते हैं। पितरों के पूजन का भी विधान है। लिहाजा लोग घरों-ऑफिसों में मृत परिजनों की तस्वीरें लगाकर पूजा करते हैं। पितरों को देवतुल्य ही माना गया है, लेकिन ये दोनों ही अलग-अलग तरीके से पूज्य हैं। दोनों की दैवीय ऊर्जा और शक्ति अलग-अलग है। यही वजह है कि लोग इनको अलग-अलग पूजते हैं। लेकिन कुछ लोग देव और पितरों को साथ रखकर पूजा करते हैं, जो अशुभ होता है।


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वास्तु शास्त्र में विश्वास रखने वाले मानते हैं कि वास्तु की दृष्टि से घर के पूजास्थल पर पितरों या पूर्वजों की तस्वीर नहीं लगानी चाहिए। वास्तु के अनुसार, पूजाघर या पूजास्थल पर पूर्वजों की तस्वीर लगाना अशांति और दुर्भाग्य का कारण बनता है। ऐसा करना पूरी तरह से वर्जित है। मान्यता है कि मृत व्यक्ति पुनः शरीर धारण करते हैं और वो किसी न किसी योनि में जन्म लेते हैं। इसलिए देवता के साथ उनकी पूजा वर्जित है। हालांकि, तमिल मान्यताओं के अनुसार पितर भी देवतुल्य हैं, क्योंकि मृत्यु उपरान्त वे भी स्वर्ग को जाते हैं, जो देवताओं की नगरी है।

वास्तु-शास्त्र में कहा गया है कि भगवान की तस्वीर को उत्तर या उत्तर-पूर्व की दिशा में तथा मृत पूर्वजों की फ़ोटो दक्षिण-पश्चिम, दक्षिण या पश्चिम में लगानी चाहिए और दोनों अलग-अलग स्थान पर पूजे जाने चाहिए। ऐसा ना करना अशांति और आर्थिक संकटों को न्योता देना है।

ज्ञात हो कि हिंदु श्राद्ध-कर्म के दौरान अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देते हैं। साथ ही सालाना आनेवाले पितृ पक्ष (जो अभी चल रहा है) के समय भी वे अपने पितरों या पूर्वजों का ध्यान और पूजन करते हैं और उनकी आत्मा की शांति की कामना करते हैं।

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