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इस बार सीता का रोल निभाएंगी ‘डाकू शर्मीली’ की मुख्य अदाकारा ‘मोना’

Updated on 5 October, 2016 at 2:50 pm By

मेरे तंगहाली से तंग आकर मेरे दोस्त मुझे दिलासा देने आए थे। बोतल में बचा आखिरी दो चम्मच रूह-आफ्ज़ा से बना बड़ा ग्लास भी उनके कौतहूल को ठंडा करने में असमर्थ था। वैसे मेरे दोस्त काफ़ी भले हैं। जब कभी भी उनको लगता है कि मैं बहुत ज़्यादा खुश या उदास हूं, तो ज़रूर अपना कीमती वक़्त देने आ जाते हैं। इस बार मैं प्रसन्न था। हां, काफ़ी प्रयास के बाद मिली नौकरी में तनख़ाह भले ही मौजूदा समय में कम है, भले ही नास्ते में ब्रेड के उपर मक्खन लंच के खाने के हिसाब से लगाना पड़ता है, भले ही दिन के बारह घंटे अख़बार को जीवनसाथी मानकर उसकी लाज बचानी होती है। लेकिन इतना तो सुकून है कि इस तरह की दिनचर्या आपको मजबूत बैल बना देती है। वह मजबूत बैल जो दिनभर खूंटे में बंधे रहकर सोचता है कि वो अपने खुरों से खुरेद कर एक दिन इस जगह को तालाब बना देगा। और मेरे दोस्त को मेरा इस तरह से ‘बैल ज़िंदगी’ निभाना उत्साहित कर गया था। वह भली-भाँति जानते थे कि इतनी मेहनत से बनी ‘खुरेदू तालाब’ में वह मुझे कैसे गोते लगाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं और ऐसे वक़्त पर उनका सलाह देना भी फ़र्ज़ था कि मैं एक ‘बेहतर बैल ज़िंदगी’ कैसे जी सकता हूं। आख़िर दोस्त हैं मेरे। और इनके जैसे भले दोस्त की जिसको बाजार का अच्छा अनुभव हो उसकी तो ज़िंदगी में ज़रूरत सबको होती ही है।


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“काफ़ी प्रयास के बाद मिली नौकरी में तनख़ाह भले ही मौजूदा समय में कम है, भले ही नास्ते में ब्रेड के उपर मक्खन लंच के खाने के हिसाब से लगाना पड़ता है, भले ही दिन के बारह घंटे अख़बार को जीवनसाथी मानकर उसकी लाज बचानी होती है। लेकिन इतना तो सुकून है कि इस तरह की दिनचर्या आपको मजबूत बैल बना देती है। वो मजबूत बैल जो दिनभर खूँटे में बँधे रहकर सोचता है कि वो अपने खुरों से खुरेद कर एक दिन इस जगह को तालाब बना देगा।”

आप कुछ बेचते क्यों नही? मेरा जवाब था जी मेरे पास है ही क्या बेचने के लिए? कुछ भी, जो बिक पाए। खरीदार तो खाली झोला लिए आराम से रोज सुबह भोंपू बजाते घूमते हैं। बस हां, चीज़ों के भाव पता होने चाहिए। अजी मैं व्यापारी कहां, सीधा-सादा लेखक हूँ। दुनियादारी का हिसाब भला मुझे कहां पता। अरे! लेखक बाबू! हिसाब रखना पड़ता है, व्यापारी बनना पड़ता है। आपको पता चला इस बार रामलीला वालों ने टिकट का दाम 25 रुपये से बढ़ा कर 75 रुपये कर दिए हैं, और वो भी शादीशुदा जोड़ों के लिए। आप तो अकेले हैं, आपके तो सौ लगेंगे। अरे भाई, ऐसा क्यों ग़ज़ब हुआ? गजब हुआ नही होने वाला है! रामायण कमेटी ने फ़ैसला लिया है कि सीता के लिए कलाकार बाहर से आएगा। कल ही तो मैं रामलीला कमेटी के अध्यक्ष नारायण बाबू शुक्ला से लल्लन की गोश्त दुकान पर मिला था। उन्होने ही सीता और बढ़े हुए दाम के बारे में बताया।

“इसीलिए कहता हूं कुछ बेचिए! इस दुनिया में चाहे दशरथ हों, या राम जिसने अपनी कला की कीमत नहीं लगाई, तो अंत में उसे विभीषण का ही किरदार नसीब हुआ है।”



हां, जनता बलराम यादव को सीता के लिबास में देख देख कर ऊब चुकी है। उसमें अब वो लचक भी नहीं रही। पर जब लौंडा जवान था, तब बड़ी धूम थी। किशन चाचा तो राम-सीता के स्वयंबर में तो खूब 5-5 की गद्दी लुटाए हैं। मैने कुछ संतोष प्रकट किया। इसीलिए कहता हूं, कुछ बेचिए! इस दुनिया में चाहे दशरथ हो या राम, जिसने अपनी कला की कीमत नही लगाई अंत में उसे विभीषण का ही किरदार नसीब हुआ है। मैने हां में हां मिलाई। दोस्त ने और गंभीरता से कहना शुरू किया, अपने मास्टर साहब को ही देख लो! विभीषण के धर्म को नौटंकी से उठाकर असल ज़िंदगी में पटक दिए। तब से लेकर आजतक तीनो भाइयों में विवाद है। मास्टरसाहब का मानना है कि पक्के की ज़मीन मस्जिद को दे दें, नेकीयत मिलेगी। वहीं बड़े और मझले इस ज़िद पर अड़े हैं कि वो मुरादाबादी बिरयानी की खोली डालें, जिसके आमदनी से हज जा सकें। मैने भी हज जाने की बात पर सहमति जताई। भला अब धर्म से बड़ा कर्म क्या हो सकता है। अपने भगवान को पाने के लिए इंसान कुछ तो जहमत उठा ही सकता है भाई। भाई का झगड़ा तो घरेलू है, वो तो सुलझ ही जाएगा। इंसान ने जन्म ही इसलिए लिया है कि वह धर्म के लिए कुछ कर सके। उसके पास अगर कुछ हो तो धर्म के निर्माण के लिए बेच सके।

“भला अब धर्म से बड़ा कर्म क्या हो सकता है। अपने भगवान को पाने के लिए इंसान कुछ तो जहमत उठा ही सकता है भाई। भाई का झगड़ा तो घरेलू है वो तो सुलझ ही जाएगा। इंसान जन्म ही इसलिए लिया है कि वो धर्म के लिए कुछ कर सके उसके पास अगर कुछ हो तो धर्म के निर्माण के लिए बेच सके।”

पर आप तो कुछ बेचिए! दोस्त ने कंधे पर हाथ रखकर कहा। बड़े नीरस आवाज़ में मैने भी जवाब दिया, मैं क्या बेचूं? मैं लेखक हूँ! मेरे पास तो धर्म भी नहीं है। तो धर्म के नाम पर कुछ बेचिए भाई!जब बछड़े की सेवा कर के आप धर्म की सेवा कर सकते हैं तो भला आप नंदी बैल क्यों ढूँढने जाएँगा? चलिए अगर आपके पास बछड़ा ना सही किसी पत्थर को ही टीक-पूज दीजिए। कोई अवतार बता कर बेच ढालिए खबर। सुना है मंदिर-मस्ज़िद के नाम पर खरीदने और बेंचने वाले वाले दोनो ही अपडेटेड हैं। पर धरम के प्रचार के नाम पर मैं क्या बेचूं? अरे भाई आप तो लेखक हैं। अगर लिखने में दम है तो आप अपने ही रामलीला में से किसी की भी खबर बेच सकते हैं। अब अपनी सीता को देख लीजिए जब से उसका लक्खू धोबी से टांका भिड़ा है, तब से रामलीला कमेटी के अध्यक्ष नारायण बाबू शुक्ला ने उसे सूर्पनखा का रोल थमा दिया है। कुछ ख़बरें ही बेच डालिए।


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खैर चलते वक़्त मेरे अभिन्न मित्र यह आइडिया भी मुझे 100 रुपये में बेच गये। आख़िर व्यापार में कोई रिश्ता जो नहीं रखते। कुछ भी कह लो उनके इस आइडिया का मैं कृतज्ञ हूं। रात का भोजन तो गुड-रोटी भी हो सकता । वैसे मेरे संपादक साहब भी कहते ही रहते हैं कि ‘जो चलेगा वही बिकेगा।


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बस अब धरम के नाम पर बेचने निकल पड़ा हूं, जिससे धरम का प्रचार हो सके। हनुमान चालीसा पढ़कर शुद्ध भक्तिमय मन से शीश झुका कर अपने लेख का शीर्षक दिया है-

“इस बार सीता का रोल निभाएंगी ‘डाकू शर्मीली’ की मुख्य अदाकारा ‘मोना’

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