ऋतब्रत के बहाने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में वर्चस्व की लड़ाई

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Updated on 14 Sep, 2017 at 9:44 pm

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मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी भारी उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। वर्ष 2011 में पश्चिम बंगाल की सत्ता से विदायी के बाद यह संभवतः पहला मौका है जब पार्टी में गुटबाजी चरम पर है और इसका कोई ओर-छोर नहीं दिख रहा। एक समय मार्क्सवादी राजनीतिक पटल पर नव नक्षत्र के तरह उदित ऋतब्रत बनर्जी को पार्टी से निकाल दिया गया है।

ऋतब्रत के निष्कासन की सिफारिश दरअसल जून महीने में ही की गई थी और इस मामले में पार्टी की केन्द्रीय समिति को अंतिम फैसला लेना था। अंततः पार्टी से उनकी विदायी तय तक दी गई। ऋतब्रत न सिर्फ राज्यसभा सांसद हैं, बल्कि वह 8 साल तक लगातार स्टूडेन्ट फेडरेशन ऑफ इन्डिया के अखिल भारतीय महासिचव रह चुके हैं।

क्या है मामला

ऋतब्रत बनर्जी इस साल के शुरू में तब चर्चा में आए थे, जब उनके लाइफ-स्टाइल को लेकर जवाब तलब किए गए। बनर्जी पर आरोप लगे कि वह महंगी घड़ी, महंगे पेन और स्मार्टफोन्स का उपयोग करते हैं। जबकि पार्टी की अपेक्षा रहती है कि इसके नेता लो-प्रोफाइल और जनता से जुड़े रहें। उन्हें इस मामले में पार्टी ने कारण बताओ नोटिस जारी किया था और मामले की तह तक जाने के लिए एक जांच कमेटी बना दी गई। जांच की रिपोर्ट आने तक उन्हें 90 दिनों के लिए निलंबित भी कर दिया गया। ऋतब्रत के जवाब से असंतुष्ट मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य कमेटी ने उनके निष्कासन की सिफारिश केन्द्रीय कमेटी को कर दी। यह मामला दबा हुआ था, कि तभी ऋतब्रत ने बांग्ला टीवी चैनल एबीपी आनंद पर प्रसारित अपने साक्षात्कार में पार्टी पर कई गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना था कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व बंगालियों के खिलाफ है। उनका आरोप है कि पोलित ब्यूरो में मुसलमानों के लिए कोटा है और मोहम्मद सलीम इसी कोटे का लाभ उठाते हुए पोलित ब्यूरो में बने हुए हैं। साथ ही उन्होंने अपने खिलाफ जांच के लिए बनाई गई कमेटी को कंगारू आयोग की संज्ञा दे दी। गौरतलब है कि इस कमेटी की अध्यक्षता मोहम्मद सलीम कर रहे थे।

साक्षात्कार में ऋतब्रत ने कहाः


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“मेरा मानना ​​है कि कम्युनिस्ट पार्टी जिसका उद्देश्य समाज को बदलने का है, उसके पोलितब्यूरो कोटा कैसे हो सकता है? यदि आप मुस्लिम हैं, तो आप पात्र हैं यदि आप एक महिला हैं, तो आप पात्र है।. क्या ये स्वीकार्य है एक कम्युनिस्ट पार्टी में? वह अपने धर्म के कारण एक पोलित ब्यूरो सदस्य बन गए हैं। मेरा मानना ​​है कि अगर उस समय पोलित ब्यूरो के सदस्य होने के हकदार थे, तो गौतम देव थे।”

यह बहुचर्चित साक्षात्कार आप यहां देख सकते हैं।

इससे पहले इंडियन एक्सप्रेस को दिए गए एक साक्षात्कार में ऋतब्रत ने कहा था कि उनकी लड़ाई पार्टी के खिलाफ नहीं, बल्कि कहा था कि उनकी लड़ाई खिलाफ नहीं, बल्कि प्रकाश और वृंदा करात के खिलाफ है।

पार्टी में वर्चस्व की लड़ाई

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि ऋतब्रत बनर्जी के बहाने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में बर्चस्व की लड़ाई चल रही है। पार्टी दो भागों में बंटी हुई है, जिसमें एक गुट का नेतृत्व प्रकाश करात कर रहे हैं, तो दूसरे का नेतृत्व सीताराम येचुरी के हाथ है। येचुरी को माकपा की पश्चिम बंगाल ईकाई का साथ हमेशा मिला है, वहीं केरल प्रकाश करात के साथ खड़ा रहता है। हालांकि, इस बार समीकरण बदले दिख रहे हैं। ऋतब्रत प्रकरण से साफ है कि पश्चिम बंगाल में मोहम्मद सलीम सरीखे वरिष्ठ मार्क्सवादी नेता अब प्रकाश करात के खेमे में हैं। ऋतब्रत बनर्जी सीताराम येचुरी के करीबी थे और उनका पार्टी से निष्कासित होना येचुरी की शिकस्त के तौर पर देखा जा रहा है।

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