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सोशल मीडिया पर ये वीडियो जारी कर कांग्रेस ने बीजेपी पर कसा अब तक का सबसे बड़ा तंज

Updated on 3 March, 2019 at 11:09 am By

बात 2014 की है जब भ्रष्टाचार और सिलसिलेवार घोटालों ने कांग्रेस की छवि को पूरी तरह दागदार कर दिया था। उस वक्त बीजेपी ने नरेंद्र मोदी जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति को लोकसभा चुनावों का चेहरा बनाया। प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों से ऐसा समा बांधा हर कोई उनका कायल हो गया। ऐसा लगने लगा कि स्कैम और भ्रष्टाचार से त्रस्त इस देश को बचाने के लिए एक मसीहा आ गया है।


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2014 के चुनावी नतीजों से ये बात तो साफ़ हो गई कि जनता ने मोदी पर दिल खोलकर अपना प्यार लुटाया है। लेकिन जैसे-जैसे वक्त का पहिया आगे चलता गया मोदी के कहे चुनावी वादे भी भाप बनकर उड़ते दिखाई देने लगे। आज चार साल बाद एक सवाल जो मुंह बाए खड़ा है वो ये कि आखिर इतने वर्षों में क्या बदला ? बीते चार साल  में पीएम मोदी के मुंह से निकली हर बात महज़ चुनावी जुमला लगने लगी है।

इन सबसे इतर एक बात जिसके लिए भाजपाइयों का फ़िलहाल पुरज़ोर विरोध हो रहा है, वो है मोदी के लिए मीडिया के मीठे बोल। फ़िलहाल देश में एक ऐसी हवा चल रही है, जिसने मीडिया की स्वतंत्रता पर बहुच बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। देश में लोगों को कलमकारों की लेखनी स्वतंत्र नहीं लग रही। ऐसा है या नहीं ये चर्चा का विषय है, लेकिन नज़र तो बिलकुल ऐसा ही आ रहा है। राष्ट्रीय मुद्दों के बजाय मीडिया की चर्चा राजनीति से प्रेरित लगने लगी है।

 

 


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हाल ही में सोशल मीडिया पर कांग्रेस ने एक पोस्ट शेयर किया है, जिसमें कांग्रेस ने कुछ ऐसा दिखाया है कि मीडिया मोदी की तारीफ़ों के कसीदे पढ़ रही है। इस पोस्ट को शेयर करते हुए कांग्रेस ने भाजपा पर सीधे निशाना साधा है। वहीं लोगों ने भी पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं।

 

पोस्ट पर आए ट्वीट्स

 

 

 

 

इस बीच कुछ लोगों ने कांग्रेस को भी आड़े हाथों लिया।

 

 

 

 


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गौरतलब है ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता से टारगेटेड जर्नलिज़्म का बदला हुआ स्वरूप आज हम सब देख रहे हैं, जिसमें सत्ता के प्रबल दावेदारों की आवाज़ें गूंज रही है। इसमें मीडिया का उद्देश्य तो दिख रहा है, लेकिन ध्यय कहीं गुम हो चुका है। मीडिया दो धड़ों में बटा हुआ नज़र आ रहा है, लिहाज़ा मीडिया की भाषा में मर्यादा के तट बंध टूटने लगे हैं। ज़्यादातर मीडिया हाउस की कमोबेश ऐसी ही स्थिति है। हालांकि, पत्रकारिता के क्षेत्र में कई मीडिया हाउसेज अभी भी अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं और वो मीडिया के खो रहे स्वामित्व को लेकर चिंतित भी हैं।

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