कम ही लोगों को पता है कि कॉफी के बीज 17वीं सदी में चोरी-छिपे भारत लाए गए थे

Updated on 19 Aug, 2017 at 6:47 pm

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हम से शायद ही कोई ऐसा हो जिसके दिन की शुरुआत चाय या कॉफी के बिना होती हो। चाय और कॉफी हमारी ज़िंदगी की ज़रूरत बन चुकी हैं। किसी से मिलने पर तो कभी इंतज़ार करते हुए समय काटने के लिए चाय और कॉफी ही तो हमारा सबसे अच्छा साथी होता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये दोनों ही चीज़ें भारत में विदेशिय़ों की देन हैं। चाय तो अंग्रेज़ों की देन है, लेकिन कॉफी का स्वाद इस देश ने कैसे चखा इसकी कहानी बहुत दिलचस्प है।

कहा जाता है कि 17वीं सदी में, एक सूफी संत बाबा बुदन मक्का की यात्रा पर गए थे। वहां उन्होंने देखा कि कॉफी, जिसे इथियोपिया में एक सदी पहले खोजा गया था, पर अरब देशों का एकाधिकार हो गया है और वो लोग सिर्फ़ भुनी या तैयार कॉफी ही निर्यात करते हैं। हमारे देश में तब तक लोग कॉफी से परिचित नहीं थे। अरब देशों का ये रवैया सूफी संत को नागवार गुज़रा तो उन्होंने यात्रा के बाद भारत लौटते समय कॉफी के कुछ बीज अपने कपड़ों में छुपा लिए। चूंकि वह संत थे, इसलिए उन्हें भारत लौटने के दौरान जांच से छूट मिली थी। देश में आने पर उन्होंने वर्ष 1670 में चिकमंगलूर में कॉफी के सात बीज लगाए।



हालांकि कि कुछ इतिहासकारों का मानना है कि बुदान से बहुत पहले ही भारत में कॉफी आ चुकी थी। हज़ेल कोलाको की किताब ‘ए कैश टू कॉफ़ी’  के मुताबिक मलाबार तट पर बहुत पहले ही अरब व्यापारी कॉफी के बीच लेकर आए थे।

खैर, भारत में कॉफी जिसने भी लाया हो, अब तो यह हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा बन चुका है। शहरों में बड़े-बड़े कॉफी हाउस में पर्सनल से लेकर कॉरपोरेट मीटिंग्स होती हैं। दोस्तों से मिलने पर कॉफी न पीएं ऐसा तो हो नहीं सकता।


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