इस महिला के पहलवान बनने की कहानी आज हर किसी के लिए एक प्रेरणा है

Updated on 5 Dec, 2017 at 1:36 pm

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जीवन में कई बार हमें निराशा हाथ लगती है और हम फिर थक-हार कर अवसादग्रस्त हो जाते हैं। ऐसे में नीतू सरकार की कहानी हमें प्रेरित करती है, जिन्होंने जीवन के कई झंझावातों का सामना करने के बाद भी हिम्मत नहीं हारीं और अपने लक्ष्य को पाकर ही दम लिया।

गौरतलब है कि मात्र 13 साल की उम्र में नीतू की जबरदस्ती शादी कर दी गई और वो 14 साल की उम्र में जुड़वा बच्चों की मां बन गईं।

 

लेकिन वह अपनी अद्भुत इच्छा शक्ति से आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों के बावजूद इंटरनेशनल रेसलर बनने में सफल हुई।


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ये है संघर्ष की गाथा-

 

दरअसल नीतू के मां-बाप ने उसे भिवानी के एक गांव में 43 साल के व्यक्ति को बेच दिया था, जिसकी मानसिक हालात भी ठीक नहीं थी। आर्थिक तंगी से परेशान नीतू वहां से भागकर घर आ गई। फिर भी नीतू के मां-बाप का दिल नहीं पसीजा और नीतू की दुबारा शादी कर दी गई।

 

गरीबी से तंग आकर नीतू ने आखिरकार अपने दिल की सुनी और मर्दों के अखाड़े में में उतरने का निर्णय लिया। हालांकि, उसे गांव वालों के विरोध का सामना करना पड़ा।नीतू को अभ्यास करने से मना कर दिया गया। उनके पति ने उनका साथ जरूर दिया लेकिन उनकी सांस कुश्ती के खिलाफ थी, लेकिन नीतू के सपनों के बीच कोई नहीं आ सकता था। पर समाज की अड़चन ने नीतू के हौसलों को झुकने नहीं दिया।

 

पति का साथ मिलने से नीतू बेझिझक अपने पैशन को लेकर समर्पित हो गई और कड़ी मेहनत से ये मुकाम हासिल किया। वे रोज़ सुबह 3 बजे उठती और डेढ़ घंटे यात्रा कर रोहतक के पास एक गांव जाती थी। वहां छह घंटे वर्कआउट और ट्रेनिंग करने के बाद रात 9 बजे तक घर आ पाती थीं।

 

 

यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि देश में नाबालिग लड़कियों की शादी आज भी एक बड़ी समस्या है। यूनाइटेड नेशंस चिल्ड्रन फ़ंड ने 2014 की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा था कि भिवानी जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में शहरों के मुकाबले जयादा लड़कियां बालवधु बनती हैं। क़ानून बनने के बाद भी भारत में 18 साल से पहले लड़कियों की शादी हो रही हैं। उधर, ग्लोबल नॉनप्रॉफ़िट गर्ल्स नॉट ब्राइड्स के अनुसार, भारत में लगभग 47 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 साल से पहले कर दी जाती हैं।

 

 

नीतू के पैशन को पंख उस वक़्त मिले जब उनकी मुलाकात कोच ज़ीले सींग से हुई। उन्होंने नीतू को प्रोत्साहित किया। नीतू के सपनों ने 2011 में आकार लेना शुरू किया।

नीतू ने रोहतक में ट्रेनिंग लेना शुरू किया। एक राष्ट्रीय इवेन्ट में नीतू ने अपना पहला कांस्य पदक जीता। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

 

नीतू ने राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीते। नवंबर 2014 में राष्ट्रीय सीनियर चैंपियनशिप में कांस्य, तो जनवरी 2015 में राष्ट्रीय खेलों में भी कांस्य पदक अपने नाम किया। अप्रैल 2015 में राष्ट्रीय जूनियर चैंपियनशिप में रजत का तमगा पाया। ब्राजील में अगस्त 2015 में विश्व जूनियर चैंपियनशिप में नीतू ने हिस्सा लिया।

नीतू कहती हैं-

“जो लोग पहले मेरे और मेरे पैशन का विरोध कर रहे थे, वे लोग आज अपनी बच्चियों को रेसलिंग सिखाने मेरे पास ही आ रहे हैं। वे कहते हैं कि उनकी बच्ची को भी अपने जैसा बना दूं।”

नीतू को अपना सपना पूरा होने से अधिक खुशी इस बात से होती है, कि लोगों का लड़कियों को देखने का नज़रिया बदला है। वे मर्दों का खेल समझे जाने वाले रेसलिंग में अब अपनी बच्चियों को उतारने से झिझकते नहीं है।


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