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प्रकृति की उपासना और आस्था का पर्व है छठ

Updated on 6 September, 2018 at 7:10 pm By

प्रकृति ही सर्वप्रथम पूजने योग्य है, क्योंकि यही जीवन देता है और प्रकृति के महत्व को बल प्रदान करता है, छठ पर्व।

छठ पर्व पवित्रता और शुध्दता को बढ़ावा देता ही है। साथ ही मनुष्य के प्रकृति के साथ जुड़ाव को भी दर्शाता है। भले ही इसे बिहार के पर्व के रूप में प्रचार मिला है, लेकिन यह उत्तर प्रदेश और नेपाल में भी प्रमुखता से मनाया जाता है।

सूर्योपासना का यह पर्व सूर्य षष्ठी को मनाया जाता है, लिहाजा इसे छठ कहा जाता है। बता दें कि यह पर्व परिवार में सुख, समृद्धि और मनोवांछित फल प्रदान करनेवाला माना जाता है। इसे स्त्री और पुरुष समान रूप से मनाते हैं। ऐसी मान्यता है कि छठ देवी भगवान सूर्य की बहन हैं, इसलिए लोग सूर्य की तरफ अर्घ्य दिखाते हैं और छठ मैया को प्रसन्न करने के लिए सूर्य की आराधना करते हैं।


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यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत मास में और दूसरी बार कार्तिक मास में। चैत शुक्ल पक्ष में षष्ठी पर मनाया जाने वाले पर्व ‘चैती छठ’ और कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिक छठ कहते हैं। बहुतायत लोग कार्तिक छठ मनाते हैं और ये अधिक प्रचलन में है।

ऐसे की जाती है छठ पूजा

छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को होती है और समापन कार्तिक शुक्ल सप्तमी को। छठ व्रती लगातार 36 घंटे का निर्जला उपवास रखते हैं। इस व्रत में शुद्धता पर बहुत अधिक ध्यान दिया जाता है, जिससे इसे कठिन व्रतों में एक माना जाता है।



व्रत के पहले दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को ‘नहाय खाय’ के रूप में मनाया जाता है। पहले दिन लोग घर-आंगन की साफ़-सफाई कर उसे पवित्र बनाते हैं। छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध भोजन ग्रहण कर व्रत शुरू करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रत करने वाले के खाने के बाद ही प्रसाद खाते हैं। भोजन के रूप में कद्दू-दाल (चना) और चावल (अरवा) ग्रहण किया जाता है।

छठ व्रत के दूसरे दिन लोहंडा या खरना मनाया जाता है, जिसमें व्रती दिनभर निर्जला उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं और शाम को प्रसाद खाने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है। खरना का प्रसाद शुद्ध प्राकृतिक होता है जो गन्ने के रस से बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पीठा, घी में रोटी, गुड़ से तैयार किया जाता है।

उगते सूरज से पहले डूबते हुए सूरज की पूजा

इस पूजा की खास बात है कि उगते सूरज से पहले डूबते हुए सूरज की पूजा की जाती है। सांध्य अर्घ्य के दिन शाम को लोग जलाशयों के घाट पर जमा होते हैं। वहां छठ के निमित्त बनाए प्रसाद को बांस की टोकरियों में लाते हैं। वहां डूबते सूर्य को अर्घ्य दिखाकर पोजा करते हैं। व्रती जल में खड़े होकर पूजा करते हैं। ऐसे ही अहल-सुबह में पहले लोग घाट पर जमा होकर सूर्योदय की प्रतीक्षा करते हैं और फिर सूर्य को अर्घ्य दिखाते हैं।


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इस पूजा में ठंढ होने का बावजूद व्रती जल में खड़े होकर सूर्य को डूबने और फिर उगने का इंतजार करते हैं। यह धैर्य और प्रतीक्षा करने की सीख देता है साथ ही हमें प्रकृति के निकट ले जाता है। पर्व का प्रसाद फलों और अन्न से बने होते हैं जो अपने मौलिक रूप में रहते हैं और उसे ही ग्रहण किया जाता है। इसे अनंत फलदायी व्रत कहा जाता है और व्रतियों की आस्था देखकर इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

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