दोनों हाथ नहीं हैं, फिर भी पैरों से उड़ने की जिद; कमजोरी को बना लिया हथियार

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9:44 pm 8 Jul, 2016

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सपनों को सच करने के लिए पंखों की नहीं हौसले की जरूरत होती है। ये है हिसार की रहने काली मीनू, जिसने 2 साल की उम्र में अपने दोनों हाथ ट्रेन की चपेट में आने की वजह से गंवा दिए थे।


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नीरू के माता-पिता के लिए ये किसी सदमें से कम नहीं था। लेकिन नीरू जैसी-जैसी बड़ी होती गई, उसने इसे अपनी कमजोरी मानने के बजाय, इसके साथ जीना सिख लिया, जिसमें वह सफल भी रही।

मीनू किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती इसलिए वह अपना हर काम खुद ही करती है। साइकिल चलाना हो या पैरों से लिखना, कपडे धोना, साफ सफाई वह हर काम बखूबी तरीके से करती है।

पढ़ने लिखने में अव्वल मीनू 5वीं कक्षा में पढ़ती है। उसके माता-पिता मजदूरी का काम करते है। मीनू के पिता कृष्ण कुमार अपनी बेटी को लेकर कहते है कि वह अपनी बेटी को किसी से कम नहीं समझते।

उनके लिए मीनू वैसी ही है जैसी की और आम लडकियां। मीनू उनके लिए आम होकर भी ख़ास है और खास होकर भी आम।

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