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हमले में घायल भाई को बचाने वाली अंजलि की कहानी NCERT में शामिल, पढ़ाया जाएगा बहादुरी का किस्सा

Published on 12 July, 2016 at 4:48 pm By

यह सच्ची कहानी आज से करीब 6 साल पहले की है। यह कहानी उस 14 साल की छोटी बच्ची के साहस और जज़्बे की है, जिसने रूह कंपा देने वाली परिस्थिति में भी अपनी जान की परवाह ना करते हुए असीम बहादुरी का परिचय दिया था। यह कहानी अब इसलिए भी ख़ास हो गयी है, क्योकि सीबीएसई ने इसे सिलेबस में शामिल कर लिया है।


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दरअसल, अंजलि नाम की इस लड़की ने अपने बेजोड़ साहस का तब परिचय दिया था जब 500 नक्सलियों के द्वारा ताबड़तोड़ गोलीबारी किए जाने के बावजूद भी छोटे भाई को अपने कंधे पर रख कर ना सिर्फ़ भागी, बल्कि उसकी जान बचाने में भी सफल हुई थी।

अंजलि और उसका परिवार नक्सली समस्या से ग्रस्त रायपुर के दंतेवाड़ा जिले में रहता था। उस वक़्त अंजलि मात्र 14 साल की थी। अंजलि के पिता अवधेश सिंह गौतम एक राजनेता होने के कारण नक्सलियों के निशाने पर थे।

यह वारदात 7 जुलाई 2010 की आधी रात 12 बजे के आसपास की है, जब करीब 500 से ज़्यादा नक्सलियों ने पूरे गाँव की घेराबंदी कर धावा बोल दिया था

नक्सलियों के इस साजिश से बेफिकर अंजलि के पिता अंदर कमरे में सो रहे थे, जबकि ड्राइवर और उसके मामा संजय बरामदे में सो रहे थे। वहीं अंजलि का भाई अभिजीत बाहर खेल रहा था।

नक्सलियों ने घर में घुसते ही सो रहे ड्राइवर और मामा को निशाने पर लिया और कई गोलियां दाग दीं, जिसके परिणाम स्वरूप ड्राइवर और मामा की मौके पर ही मौत हो गई। गोलीबारी की आवाज़ सुन कर घर में अफ़रातफ़री की स्थिति बन गई और इधर नक्सलियों ने दरवाजा तोड़ घर में घुस कर अंधाधुन गोलियां बरसाने लगे।

गोलीबारी में अंजलि के भाई अभिजीत के पैरों में भी गोली लग गई। अपने भाई को दर्द से कराहता देख अंजलि निडर होकर अपने भाई के पास गई और उसे अपनी पीठ पर लादकर नक्सलियों के गोलीबारी की परवाह किए बिना घर से बाहर भाग गई।



अंजलि को भागता देख नक्सलियों ने बगल वाले घर को धमाके से उड़ा दिया। यही नहीं, अंजलि को रुक जाने की चेतावनी भी दी गई। अंजलि को रुकता न देख उसपर भी कई गोलियां भी दागी गई।

अंजलि बताती है कि उस परिस्थिति में उसको लगा कि इस हमले में उसके अलावा घर के सारे लोग मारे जा चुके हैं। फिर भी अंजलि ज़रा भी नहीं घबराई। उसने विपरीत हालात में भी निर्भीक होकर अपने भाई को कंधे पर लादकर सुरक्षित अपने दादा के घर ले जा कर अदम्य साहस का परिचय दिया।

बाद में अंजली की इस बहादुरी के लिए प्रेसिडेंट ब्रेवरी अवॉर्ड और 2012 में जोनल फिजिकल ब्रेवरी अवॉर्ड समेत कई और पुरस्कारों ने सम्मानित किया गया।

अंजलि के इस साहस और निर्भीकता के किस्से को सीबीएसई के पांचवीं क्लास के सिलेबस में शामिल कर लिया गया है और  इस सेशन से पढ़ाई भी शुरू हो चुकी है।


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निश्चित रूप से यह  सीबीएसई का सराहनीय प्रयास है, जो उसने इस छोटी बच्ची की साहस की सच्ची कहानी को एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक में शामिल कर सैकड़ों बच्चों को प्रोत्साहित करती रहेगी।

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