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एशियाड में पहला गोल्ड दिलाने वाले इस बॉक्सर ने कैंसर को भी किया नॉक आउट!

Published on 7 September, 2018 at 11:35 am By

किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए संघर्ष करना ही पड़ता है, लेकिन अगर बात राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खेल प्रतियोगिताओं की हो, तो यह संघर्ष कई गुना बढ़ जाता है। इतने बड़े देश में एक से एक प्रतिभाओं को पीछे छोड़ने के बाद राष्ट्रीय टीम में जगह मिलती है और वहां बने रहने के लिए लगातार अभ्यास की जरूरत होती है। क्रिकेट की खबर तो हम लोग लेते रहते हैं, लेकिन ऐसे ही दूसरे खेलों के खिलाड़ी भी बहुत मेहनत से मुकाम हासिल करते हैं।


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ऐसे ही एक खिलाड़ी हैं बॉक्सर नगागेम डिंको सिंह!

 

 

साल 1998 में एशियन गेम्स खेलते हुए बॉक्सिंग में पहली बार भारत को सोना दिलाने का गौरव बॉक्सर नगागेम डिंको सिंह के नाम है। हम भले ही इस पुरानी उपलब्धि को भूल चुके हों, लेकिन आज भी बॉक्सिंग से जुड़े लोग इनसे प्रेरणा लेते हैं। इनकी कहानी वाकई बेहद दिलचस्प है, तभी इन्हें बॉक्सर्स अपना रोल मॉडल मानते हैं।

 

 

डिंको ने मात्र 19 साल की उम्र में बैंकॉक में हुए एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने में कामयाबी हासिल की थी, लेकिन ये इतना आसान नहीं रहा था। गरीबी से लड़ते हुए ये कब नक्सली बने, इन्हें खुद भी नहीं पता चला। जब होश आया तो ये वहां से निकले और खेलने में दिल लगाया। हालांकि, वहां भी खेल की राजनीति का शिकार होना पड़ा। ये सब चल ही रहा था तो इन्हें कैंसर जैसी गंभीर बीमारी हुई और इन्होंने उसे भी मात दे दी।


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अनाथालय में पले-बढे डिंको सिंह ने 1989 में नेशनल सब जूनियर बॉक्सिंग जीता और 13 साल की उम्र में ट्रेनिंग के लिए अंबाला आ गए। साल 1997 में इन्होंने बैंकॉक में हुए किंग्स कप में खेलते हुए मुक्केबाज़ों को नॉक ऑउट कर सफलता हासिल की, लेकिन खेल की राजनीति ने रास्ता रोक दिया। जब 1998 में होनेवाले एशियन गेम्स के बॉक्सर्स की लिस्ट आई तो इनका नाम ही नहीं था। बाद में जब आवाज उठी, तो इन्हें शामिल किया गया।

 

 

इन्होंने वहां भरोसा करने वाले को निराश नहीं किया, बल्कि फ़ाइनल में डिंको सिंह ने दुनिया में तीसरी रैंकिंग वाले उज़्बेकिस्तान के बॉक्सर तिमूर को हरा दिया। 1998 में उन्हें सरकार ने अर्जुन अवॉर्ड दिया, तो वहीं नेवी में नौकरी भी दी। बाद में इन्होंने बॉक्सर्स को ट्रेनिंग देनी शुरू की। साल 2017 में इन्हें पता चला कि कैंसर हैं। इस मुश्किल घड़ी में क्रिकेटर गौतम गंभीर और बॉक्सर सरिता देवी ने उनकी सहायता की। अब वे 13 राउंड कीमोथेरेपी कराने के बाद स्वस्थ हो चुके हैं।

 

 

बीमारी से उबरते हुए वे फिर से बॉक्सर्स को ट्रेनिंग देने में लग गए हैं। वे 2024 के ओलंपिक्स के लिए 2 ओलंपियन बॉक्सर को तैयार कर रहे हैं।


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इनका जीवन संघर्ष सदा खिलाड़ियों को हौसला देता रहेगा।

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