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मीडिया आदर्श व्यक्तियों को याद करने में चूक क्यों रहा है?

Published on 18 January, 2017 at 4:38 pm By

मेनस्ट्रीम मीडिया के सामने यह चुनौती रहती है कि कौन सी खबर श्रोता, दर्शक या पाठक के सामने पेश किया जाए। वो खबरें मनोरंजन के रूप में भी हो सकती हैं और समाचार के भी रूप में भी। फर्क बस अब इतना हैं कि पहले जहां मीडिया संस्थानों के आदर्श होते थे, जिसकी वजह से ख़बरों कि गुणवत्ता बनी रहती थी। अब वहीँ, ख़बरों का स्तर आश्चर्यजनक रूप से गिरा है। मुख्य धारा की पत्रकारिता में बिकाऊ ख़बरों की प्रवित्ति बढ़ी है।


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यह दौर अफवाहों और मसाला ख़बरों का है। परंतु यह बेहद अफ़सोसजनक है कि इस मीडिया के बदले रूप की वजह से हम उन ख़बरों से वंचित रह जा रहे हैं, जिनके बारे में हमें निश्चित रूप से जानकारी होनी चाहिए। कम से कम इतनी तो कोशिश रहनी ही चाहिए कि हम भारत के आदर्श व्यक्तियों को याद रख सकें। कुछ महीने पहले ही टॉपयप्स ने भारत के मिसाइल मैन अब्दुल कलाम के स्मारक पर हो रही दुर्गति कि खबर चलाई थी। हमारी टीम एक अन्य भारतीय वैज्ञानिक के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं, जिनको मेनस्ट्रीम मीडिया कवर करना भूल गया।

अंतरिक्ष में मौजूद ‘ब्लैक होल्स’ को जब उनका नाम भी नहीं मिला था, उससे पहले से प्रोफेसर सी.वी विश्वेश्वरा उन पर शोध कर रहे थे। 17 जनवरी, मंगलवार को उनका लंबी बीमारी के कारण बेंगलुरु में देहांत हो गया। प्रोफेसर विश्वेश्वरा ने 2015 में उस शोध को दिशा देने में सहायक भूमिका निभाई थी, जिसमें दो ब्लैक होल का विलय होता है।



2016 में आपने ग्रेविटेशनल वेव की खोज के बारे में सुना होगा। इसकी खोज में भी प्रोफेसर साहब की अहम भूमिका थी। वह जवाहरलाल नेहरू प्लेनेटोरियम, बेंगलुरू के निदेशक थे।

प्रोफेसर विश्वेश्वरा दूसरे वैज्ञानिकों की तरह नहीं थे। उनको कार्टून बनाने का भी बहुत शौक था। द हिन्दू को दिए एक साक्षात्कार में डॉक्टर साहब ने कहा थाः

“आर्टिस्ट बनना मेरा सपना था। 2005 में तो एक जर्मन साइंस मैगज़ीन ने आइंस्टीन पर बनाये गए मेरे कार्टून को प्रकाशित भी किया था और उसके लिए मुझे पैसे भी मिले थे।”


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एक वैज्ञानिक, शिक्षक और कलाकार के खोने का गम भारत को हमेशा रहेगा, लेकिन यह बेहद दुःखद है कि मीडिया ने उनको जगह नहीं दी। टॉपयप्स टीम प्रोफेसर साहब को श्रद्धांजलि अर्पित करती है।

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