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19वीं सदी के प्रमुख जननायकों में एक थे बिरसा मुंडा, जीवनकाल में ही मिला था महापुरुष का दर्जा

Published on 6 August, 2016 at 12:43 pm By

बिरसा मुंडा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नायकों में से एक रहे हैं। वह बिरसा ही थे, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ मुंडा आदिवासियों के महान आंदोलन उलगुलान का नेतृत्व किया था।

छोटानागपुर के अकाल पीड़ित क्षेत्र में बिरसा मुंडा का प्रभाव इतना बढ़ा कि आदिवासियों में संगठित होने की चेतना का विकास हुआ। यही वजह थी कि 19वीं सदी के अंत में स्थानीय स्तर पर अंग्रेजी शासन के खिलाफ बड़ा आंदोलन छेड़ दिया और इसमें उन्हें सफलता भी मिली।

बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को रांची के नजदीक उलीहातू गांव में हुआ था। उन्होंने प्रारंभिक पढ़ाई नजदीक के ही साल्गा गांव में पूरी की। बाद की पढ़ाई के लिए वह चाईबासा इंग्लिश मिडिल स्कूल आ गए।


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वर्ष 1984 में मानसून बेहतर न होने की वजह से छोटा नागपुर के क्षेत्र में अकाल पड़ गया। इससे पूरे इलाके में त्राहि-त्राहि मच गई। अकाल की वजह से यहां महामारी फैली। इस कठिन समय में बिरसा ने अपने लोगों को नेतृत्व प्रदान किया और उनकी खूब सेवा की।

कठिन परिस्थिति के बावजूद अंग्रेज लगान पर अड़े हुए थे। तमाम मुडा आदिवासियों को एकत्र कर बिरसा भी अड़ गए। उन्हें 1895 में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें दो साल जेल की सजा दी गई।

वर्ष 1897 में जेल से निकलने के बाद आदिवासियों और अंग्रेज सिपाहियों के बीच कई झड़पें हुईं। बिरसा मुंडा के नेतृत्व में आदिवासियों नें अंग्रेजों को चने चबवा दिए थे। वर्ष 1897 के अगस्त महीने में बिरसा और उनके चार सौ से अधिक समर्थकों ने तीर-कमानों से लैस होकर खूंटी थाने पर धावा बोल दिया।



वर्ष 1898 को तांगा नदी के किनारे हुए एक अन्य लड़ाई में भी आदिवासियों ने अंग्रेजों को पीछे हटने के लिए बाध्य कर दिया। हालांकि, बाद में अंग्रेजों ने कई आदिवासियों नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।

छोटा नागपुर के डोमबाड़ी पहाड़ी पर वर्ष 1900 के जनवरी महीने में एक बार फिर संघर्ष हुआ। इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चों ने अपने प्राण गंवाए। दरअसल, उस स्थान पर बिरसा मुंडा आदिवासियों की एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे, तभी अंग्रेजों ने हमला कर दिया।

इस घटना के बाद बिरसा के कई समर्थक गिरफ्तार कर लिए गए। वर्ष 1900 की 3 फरवरी को बिरसा मुंडा को भी चक्रधरपुर से गिरफ्तार कर लिया गया। इसी साल 9 जून को बिरसा ने रांची कारागार में अंतिम सांसें लीं।


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बिरसा मुंडा को आज भी बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में भगवान की तरह पूजा जाता है। उन्हें अपने जीवनकाल में ही महापुरुष का दर्जा प्राप्त हो गया था। इस इलाके में लोग उन्हें “धरती बाबा” के नाम से पुकारते हैं।

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