यमराज से जुड़ी है भाई दूज की कथा, जानिए इसका महत्व

Updated on 8 Nov, 2018 at 5:26 pm

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सनातन संस्कृति में अनेक त्योहार मनाए जाते हैं। सभी प्रकार के पर्व मनाने के पीछे कोई न कोई कहानी होती है जो जीवन के बेहद निकट से जुड़ी होती है। रक्षाबंधन की तरह ही दीपावली के दो दिन बाद भाई दूज का पर्व मनाया जाता है। इस दिन बहन अपने भाई की लम्बी उम्र की कामना करती हैं। वहीं भाई बहन से मिलकर उसका आतिथ्य स्वीकारते हैं।

शायद ही आपको पता हो भाई दूज को यमद्वितीया भी कहा जाता है। इससे जुड़ी कथा भी कम रोचक नहीं है।

 

 


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बताया जाता है सूर्य नारायण की पत्नी छाया की दो संताने थीं। बेटे का नाम यमराज था तो वहीं बेटी यमुना थी। दोनों भाई-बहन खूब प्यार था। यमुना भाई यमराज से अपने घर भोजन आने को बार बार कहती थी, लेकिन यमराज व्यस्त होने के कारण नहीं जा पाते थे।

लेकिन बार बार अपनी बेहेन को मना करना भी यमराज को अच्छा नहीं लगता था। उन्होंने आखिरकार एक दिन फ़ैसला लिया वो बहन यमुना के घर जाएंगे।  बेहेन यमुना जिस सद्भावना से उन्हें बुला रही थी, उन्होंने उसका पालन करना अपना धर्म समझा।  यमराज ने जिस दिन जाने का फ़ैसला किया, वह कार्तिक मास की द्वितीया तिथि थी। यमराज ने जाते वक्त यमलोक में जितने जीव कष्ट भोग रहे थे, सभी को छोड़ दिया।

 



यमुना अपने भाई को पाकर बहुत खुश हो जाती है और वे यमराज का खूब आदर सत्कार करती हैं। यमुना के आतिथ्य से खुश होकर यमराज उन्हें वरदान मांगने को कहते हैं। यमुना ने कहा आप ऐसे ही प्रत्येक वर्ष मेरे यहां आया करें। अगर कोई बहन इस दिन अपने भाई का सत्कार कर टीका करे तो उसे आपका यानी यमराज का भय न हो। यमराज उन्हें वर देते हुए धन धान्य और उपहार देकर यमलोक को चले जाते हैं।

ऐसी मान्यता है जो आतिथ्य स्वीकार करते हैं, उन्हें यम का भय नहीं रहता। तभी से भाई-बहन के अटूट रिश्ते के इस पर्व को मनाया जाता है।

 

 

इस दिन व्यस्त रहने के बावजूद बहन से टीका कराना शुभ माना जाता है। ये विशेषकर यमराज और यमुना के पूजन का दिन होता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे कई नामों से जाना जाता है।


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