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‘नमस्कार’ मुद्रा अपनाने से होंगे ये 10 बड़े फायदे, आप भी जानिए

Published on 30 March, 2016 at 5:20 pm By

भारतीय उपमहाद्वीप में अभिवादन की सबसे प्रचलित परम्परा है ‘नमस्कार’। सामने वाले व्यक्ति के प्रति ‘सम्मान’ जताने के लिए सहस्त्रों वर्षों से आर्यावर्त में ‘प्रणाम’ या नमस्कार मुद्रा का प्रचलन है। प्रणाम अर्पित कर अपने इष्ट को, अपने बड़े-बुजुर्गों, माता-पिता और गुरुजनों की श्रेष्ठता के प्रति आदर व्यक्त किया जाता है। इसका प्रयोग किसी व्यक्ति से मिलने अथवा उससे विदाई लेते समय, दोनों में किया जाता है।

नमस्कार करते समय उस व्यक्ति की पीठ आगे की ओर झुकी हुर्इ, छाती के मध्य में हथेलियां आपस में जुड़ी हुई व उंगलियां आकाश की ओर होती हैं।



इस मुद्रा के साथ-साथ वह व्यक्ति ‘नमस्ते’, ‘नमस्कार’ या प्रणाम शब्द बोलते हुए अभिवादन करता है। पिछले 100 वर्षों से भारतीय संस्कृति पर पश्चिम के लगातार बढ़ते प्रभाव से ‘नमस्कार’ मुद्रा को काफ़ी क्षति पहुंची है। ख़ास तौर पर शहरी श्रेष्ठ वर्ग अपनी आधुनिकता प्रमाणित करने के लिए हॉय-हेलो का प्रयोग करने लगा है। नमस्कार बेहद लाभकारी है और आपको सकारात्मक रखने वाली ‘मुद्रा’ है। हम यहां इसके फायदों का जिक्र करेंगे।

1. प्रणाम के लिए जब हम गुरुजनों के चरणों में झुकते हैं, तो उनकी प्राण ऊर्जा से जुड़ जाते हैं और वह ऊर्जा प्रणाम करने वाले की चेतना को भी ऊपर उठाती है।

2. नमस्कार करते समय यदि हम ऐसा विचार रखते हैं कि “आप हमसे श्रेष्ठ हैं”, यह भाव अहंकार को कम करने और विनम्रता को बढ़ाने में सहायक होता है।

3. हमारे हाथ के तंतु मस्तिष्क के तंतुओं से जुड़े हैं। हथेलियों को दबाने से या जोड़े रखने से हृदयचक्र और आज्ञाचक्र में सक्रियता आती है, जिससे जागरण बढ़ता है। और व्यक्तित्व में ओज की क्रियाशीलता में बढ़ोत्तरी होती है।

4. किसी को नमस्कार करते हुए हम घोषणा करते हैं कि सभी के हृदय में एक ही दैवीय चेतना और प्रकाश है जो अनाहत चक्र (हृदय चक्र) में स्थित है। यह भाव एकत्व और विश्व बंधुत्व के भाव को विकसित करता है। शायद इसी परम्परा के कारण हम कभी ‘विश्वगुरु’ माने जाते थे।

5. इसके आध्यात्मिक लाभों के कारण, नमस्कार करने वाले दोनों व्यक्तियों के बीच की नकारात्मक स्पंदन कम हो जाते हैं और सात्विक स्पंदन का लाभ प्राप्त होता है। इससे तनाव और डिप्रेशन में काफी लाभ मिलता है।

6. नमस्कार मुद्रा में, दैवी चैतन्य पर्याप्त मात्रा में देह में अवशोषित होता है। ‘नमस्ते’ अथवा नमस्कार शब्द के कहने मात्र से आकाशतत्व का आह्वान हो जाता है। इन शब्दों को हाथ की मुद्रा के साथ कहने पर पृथ्वीतत्व का भी आह्वान होता है। इस प्रकार पांच संपूर्ण सृष्टि के सिद्धांतों को अधिकाधिक मात्रा में जागृत करने पर अत्यधिक आध्यात्मिक सकारात्मकता आकृष्ट होती है।

7. हॉय-हेलो आपको भले ही आधुनिक गर्व का एहसास कराता है, लेकिन प्रणाम में जैसी आश्वस्तता प्रतीत होती है, वह अद्भुत और अलौकिक होती है। इसका संबध न केवल एक व्यक्ति के साथ, अपितु सम्पूर्ण प्रकृति के निमित्त होता है। इस मुद्रा के सही अभ्यास से अपने भीतर ऊर्जा का उफान उठता प्रतीत होता है, जो भाव, बोध और मस्तिष्क में रहने वाली बुद्धि का अतिक्रमण करते हुए ऊपर ही ऊपर फैलता अनुभूत होता है।

8. सूर्य नमस्कार की शुरुआत भी इसी मुद्रा से होती है। इसी मुद्रा में कई आसन किए जाते हैं। प्रणाम विनय का सूचक है। योगासन और अन्य प्राणायामों की शुरुआत के पूर्व इसे अवश्य करना चाहिए। इसको करने से चित्त प्रसन्न रहता है और हर कार्य में सफलता मिलती है।

9. इसके आध्यात्मिक लाभ के कारण, नमस्कार करने वाले दोनों व्यक्तियों के बीच का नकारात्मक स्पंदन कम हो जाता है और सात्विक स्पंदनों का लाभ प्राप्त होता है। अनिष्ट शक्ति से पीड़ित व्यक्ति के नमस्कार करने पर भी नकारात्मक स्पंदन का प्रभाव बहुत ही सीमित होता है। नमस्कार भावपूर्ण होने पर नकारात्मक स्पंदन पूर्ण रूप से नष्ट हो जाते हैं।

10. सनातन शास्त्रों के अनुसार हर रोज बड़ों के अभि‍वादन से आयु, विद्या, यश और बल में वृद्धि होती है। और तो और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह मुद्रा कई प्रतिकूल ग्रहों की अशुभता को भी समाप्त करने में सक्षम है।

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