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इस तरह रसगुल्ला बना ‘असहिष्णुता’ की वजह

Published on 18 January, 2016 at 5:22 pm By

रसगुल्ला एकमात्र ऐसी मिठाई है, जिसकी चाशनी और रस के सामने अच्छे-अच्छे नमकीन प्रेमी हार मान लेते हैं। आपकी जीभ में सबसे अलग तरह की मतलब ‘सहिष्णु’ टाइप मिठास भरने वाले ‘रसोगोल्ला’ ने आजकल दो प्रांतों के बीच ‘असहिष्णुता’ की स्थिति निर्मित कर दी है।


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बचपन से हम आप सुनते आ रहे हैं कि फलां-फलां राज्य के बीच नदी के पानी को लेकर कभी किसी खनिज स्तोत्र को लेकर विवाद है। लेकिन पिछले दो-चार महीनों से भारतवर्ष के दो पूर्वी राज्यों ओडिशा और पश्चिम बंगाल के बीच रसगुल्ले को लेकर एक विचित्र प्रकृति का विवाद खड़ा हो गया है।

दोनों राज्य इस मिठाई को अपनी-अपनी प्रांतीय पहचान देने की जद्दोजहद में भिड़ गए हैं।

कैसे असहिष्णु हुआ रसगुल्ला?

पिछले साल अगस्त के पहले हफ्ते में ओडिशा के ‘पाहल’ नामक स्थान विशेष को स्थानीय राज्य सरकार ने मथुरा के पेडे और आगरा के पेठे की तर्ज पर ‘पाहल’ के रसगुल्ले को भौगोलिक संकेतक (Geometrical Identification) बनाने के लिए आवेदन कर दिया। इसकी ऐतिसाहिकता सिद्ध करने के लिये ओडिशा वालों ने मुंह में रसगुल्ला दबाकर रसगुल्ले को भगवान जगन्नाथ का सदियों पुराना नैवेद्य बताया।

मान्यताओं के मुताबिक, जगन्नाथ रथयात्रा के बाद देवी लक्ष्मी को मनाने के लिए भगवान जगन्नाथ उन्हें रसगुल्ले से मनाते हैं। मंदिर के पुजारियों के अनुसार यहां रसगुल्ले की परंपरा कम से कम एक हजार साल पुरानी है। बस फिर क्या था! रसगुल्ले के ‘जन्मदाता’ के रूप में प्रसिद्द बंगाल के इतिहासविद और पाकशास्त्री ‘रोशगोल्ला’ की मिठास को दूसरे राज्य को हड़पते देख अटैकिंग मोड में आ गए।



बंगाली विद्वानों के अनुसार छेना जो की रसगुल्ले की सबसे आधारभूत इकाई है वह मध्यकालीन इतिहास में कहीं वर्णित ही नहीं है। दूसरा तर्क यह की छेना दूध को एक ख़ास तरह के रसायन से फाड़ कर बनाया जाता है,जो आठ सौ या हजार पहले अस्तित्व में ही नहीं था।

बंगालियों के अनुसार 1866 में नोबिन दास ने बनाया पहला रसगुल्ला

इसी विवाद के बीच उन्नीसवीं शताब्दी के मिठाई व्यापारी नोबिन चंद्र दास जो की रसगुल्ले की माई-बाप कहे जाते हैं, के वंशजों ने ममता दीदी से इस मामले में हस्तक्षेप करने को कहा है। माना जाता है की 1858 से 1866 के बीच बंगाल के एक छोटे से हलवाई नोबिन दास ने छेने को तलकर उसे गोल बनाए रखने की तकनीक विकसित की और इसे मीठी चाशनी में घोलकर बनाया पहला रसीला रसगुल्ला।


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इसके बाद इसे जिसने भी खाया वो इसका दीवाना हो गया। इसका नामकरण भी दास ने उस समय अचानक ही कर दिया जब उनके पहले ग्राहक ने इस ‘मिठाई’ का नाम पूछा। गोल-मटोल आकृति के कारण उन्होंने इसका नाम ‘रसो-गोल्ला’ कर दिया जो बाद में अपभ्रंशित होकर ‘रसगुल्ला’ बन गया।

क्या रसगुल्ला भी था अवार्ड वापसी की वजह?

पिछले साल के अंतिम चरण में देश में फ़ैली कथित असहिष्णुता को लेकर साहित्यकारों और फिल्मकारों द्वारा अवार्ड वापसी आंदोलन चलाया गया। संयोग से इसमें बंगाल के काफी लोग शामिल रहे और चूंकि रसगुल्ला विवाद भी समकालीन था। इससे संदेह यह भी है कही ‘रसगुल्ले’ पर असहिष्णुता की वजह भी तो अवार्ड वापसी की वजह नहीं थी!

यदि ऐसा है तो रसगुल्ले पर ओडिशा और बंगाल के विवाद ने हम पत्रकारों को खूब फ़ायदा पहुंचाया। लोगबाग़ सहिष्णुता का दावा ठोंकते ही रह गए की हमारी बिरादरी के लोगों ने उसे हर एंगल से देश भर में ढूंढ निकाला।


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खैर, अब जब असहिष्णुता के बादल छट चुके है इसलिए हमारी तो भैया बंगालियों और उड़िया भाषियों को सलाह है कि अब वो भी इस विवाद को ख़त्म करें और भारत की सहिष्णुतावादी और समन्वयवादी की मिठास को रसगुल्ले में भरकर चखिए और बोलिये ‘वाह-वाह’।

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