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यहां सिर्फ 21 सिख सैनिकों ने 10 हजार अफगानों को नाकों चने चबा दिए

Published on 1 May, 2016 at 12:17 pm By

“सवा लाख से एक लडाऊं” गुरुगोविन्द सिंह जी का सबसे लोकप्रिय सवैया रहा है। व्यवहारिक तौर पर तो यह महज एक ‘रूपक’ के सिवाय कुछ भी समझा नहीं जाता, लेकिन मेजर बाना सिंह, कुलदीप सिंह चांदीपुरी, हवलदार ईशर सिंह जैसे असंख्य सिख वीरों ने अतुलित पराक्रम से अपने दसवें गुरु के इस प्रतीकात्मक ‘सवैये’ की असंभाव्यता को नकार संभव कर दिखाया है।

इतिहास के पन्नों में सुनहरी कलम से दर्ज 12 सितम्बर 1897 की उस “सरागढ़ी की जंग” को कौन भुला सकता है, जहां महज 21 सिख योद्धाओं ने अकेले ही हजारों की तादात में अफगानी फ़ौज को नाकों चने चबा दिए।

जी हां ! यह कोई कपोल कल्पित पराक्रम कथा नहीं, बल्कि असंभव सी प्रतीत होने वाली नितांत सत्य घटना है।


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आज हम इतिहास की इस सबसे महान जंग पर प्रकाश डालेंगे, जिससे हमें एक बार फिर ‘राष्ट्र रक्षक’ सिखों के पराक्रम पर गर्व महसूस हो सके।

1. ‘सरागढ़ी’ पश्चिमोत्तर सीमांत (अब पाकिस्तान) में स्थित हिंदुकुश पर्वतमाला की समाना श्रृंखला पर स्थित एक छोटा सा गांव है। लगभग 119 पहले हुई एक जंग में सिख सैनिकों के अपरिमित शौर्य और साहस ने इस गांव को दुनिया के नक़्शे में एक महत्वपूर्ण स्थान के रूप में चिन्हित कर दिया।

2. ब्रिटिश शासनकाल में 36 सिख रेजीमेंट जो की ‘वीरता’ का पर्याय मानी जाती थी,’सरगढ़ी’ चौकी पर तैनात थी। यह चौकी रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण गुलिस्तान और लाकहार्ट के किले के बीच में स्थित थी।

3. यह चौकी इन दोनों किलों के बीच एक कम्यूनिकेशन नेटवर्क का काम करती थी। सितम्बर 1897 में आफरीदी और अफगानों ने ब्रिटिश के विरुद्ध हाथ मिला लिया। ब्रिटिश खुफिया विभाग स्थानीय कबीलायी विद्रोहियों की बगावत को भांप न सके।

4. अगस्त के अंतिम हफ्ते से 11 सितंबर के बीच इन विद्रोहियों ने असंगठित रूप से किले पर दर्जनों हमले किए, लेकिन अंग्रेजों की तरफ से लड़ रहे सिख वीरों ने उनके सारे आक्रमण विफल कर दिए।

5. 12 सितम्बर की सुबह करीब 12 से 15 हजार पश्तूनों ने लॉकहार्ट के किले को चारों और से घेर लिया। हमले की शुरुआत होते ही सिग्नल इंचार्ज ‘गुरुमुख सिंह’ ने Lt.col. जॉन हॉफ्टन को हेलोग्राफ पर यथास्थिती का ब्योरा दिया, परन्तु किले तक तुरंत सहायता पहुंचाना काफी मुश्किल था।

6. मदद की उम्मीद लगभग टूट चुकी थी, लेकिन सिख वीरों ने आत्मसमर्पण करना स्वीकार नहीं किया। स्थिति की गंभीरता देखते हुए लांस नायक लाभ सिंह और भगवान सिंह ने अपनी रायफल उठा ली और अकेले ही जंग लड़ने का फैसला किया। शत्रुओं को गोली से भूनते हुए आगे बढ़ते भगवान सिंह शहीद हो गए।

7. उधर सिखों के हौंसले से, पश्तूनों के कैम्प में हडकंप मचा था। उन्हें ऐसा लगा मानो कोई बड़ी सेना अभी भी किले के अन्दर है। उन्होंने किले पर कब्जा करने के लिए दीवाल तोड़ने की दो असफल कोशिशें की।

8. हवलदार इशर सिंह ने नेतृत्व संभालते हुए,अपनी टोली के साथ “जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल” का नारा लगाया और दुश्मन पर झपट पड़े। हाथापाई में 20 से अधिक पठानों को मौत के घात उतार दिया।

9. गुरमुख सिंह ने अंग्रेज अधिकारी से कहा- “हम भले ही संख्या में कम हो रहे हैं, पर अब हमारे हाथों में 2-2 बंदूकें हो गई हैं। हम आख़िरी सांस तक लड़ेंगे”, इतना कह कर वह भी जंग में कूद पड़े।

10. पश्तूनों से लड़ते-लड़ते सुबह से रात हो गई और अंततोगत्वा सभी 21 रणबांकुरे शहीद हो गए। जीते-जी उन्होंने उस विशाल फ़ौज के आगे आत्मसमर्पण नहीं किया।

11. इस जंग में उन 21 वीरों ने करीब 500 से 600 पश्तूनों का शिकार किया। पठान बुरी तरह थक गए और तय रणनीति से भटक गए, जिसके कारण वे ब्रिटिश आर्मी से अगले दो दिन में ही हार गए। पर यह सब उन 21 सिख योद्धाओं के बलिदान के परिणामस्वरूप ही हो सका।

12. इस ‘महान’ और असंभव लगने वाली जंग की चर्चा समूचे विश्व में हुई। लन्दन स्थित हाउस ऑफ़ कॉमंस ने एकस्वर से इन सिपाहियों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की। यूनेस्को ने इसे विश्व की 8 सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ जंगों में शामिल किया है।

13. मरणोपरांत सभी 36 रेजीमेन्ट के सभी 21 शहीद जवानों को परमवीर चक्र के समतुल्य (विक्टोरिया क्रॉस) से सम्मानित किया गया। ब्रिटेन में आज भी ‘सरागढ़ी की जंग’ को शान से याद किया जाता है।

14. भारतीय सेना की आधुनिक सिख रेजीमेंट 12 सितम्बर को हर साल सरागढ़ी दिवस मनाते हैं। यह दिन उत्सव का होता है, जिसमे उन महान वीरों के पराक्रम और बलिदान के सम्मान में जश्न मनाया जाता है।

15. भारत और ब्रिटेन की सेना ने 2010 में ‘सरागढ़ी की जंग’ के स्मरण में एक “सरागढ़ी चैलेन्ज कप” नाम की ‘पोलो’ स्पर्धा शुरू की है। इसके बाद से इसे हर साल आयोजित किया जा रहा है।



सरागढ़ी की जंग में यद्यपि सिख योद्धा ब्रिटिश सेना की तरफ से लड़ रहे थे, लेकिन उनके भीतर सिर्फ राष्ट्ररक्षा का जूनून था। खालसा पंथ की स्थापना के साथ ही ‘सिखों’ ने राष्ट्ररक्षा को ही अपना धर्म मान लिया। कभी पाकिस्तान कभी मुग़ल तो कभी अफगानी पठान, भारतवर्ष की गरिमा और संप्रभुता पर प्रहार करने वाले सभी शत्रुओं को सिखों ने मुंहतोड़ जवाब दिया।

लोंगेवाला, सरागढ़ी, कारगिल और न जाने कितने ऐसे युद्ध के मैदान हैं, जहां की माटी सिख सैनिकों की अतुलित वीरता और बलिदान के गीत गाती है।

लेकिन अफ़सोस है कि हमारे समाज के कई ऐसे लोग नादानी में ‘सरदारों’ का मजाक उड़ाते हैं। उन्हें कई बार सार्वजनिक स्थलों में अपमानित भी करते हैं। उनके बुद्धिकौशल पर सवाल उठाने वाले ‘जोक्स’ फैलाते हैं।

ऐसे लोगों को इस लेख को अवश्य पढ़ना चाहिए और यह समझना चाहिए की अपने बौद्धिक चातुर्य और अपरिमित शौर्य के समुचित उपयोग से ही सिखों ने भारतवर्ष की अखंडता की रक्षा की। हम सभी भारतवासियों का यह कर्तव्य होना चाहिए की ‘सिखों’ के विरुद्ध हो रहे दुष्प्रचार पर पूरा संज्ञान लें व पूरी जिम्मेदारी से इन्हें फैलनें से रोकें।


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तभी हम अपने वीर सिख भाइयों के बलिदानों को सच्चा सम्मान और श्रद्दांजली प्रदान कर सकेंगे।

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