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इस कॉन्वेन्ट स्कूल में नहीं लगती है फीस; सिर्फ एक पौधा देकर ले सकते हैं दाखिला

Updated on 24 December, 2016 at 5:41 pm By

कॉन्वेन्ट स्कूल और फीस का बड़ा ही व्यापक संबंध है। स्कूलों में फीस की वजह से अभिभावक आतंकित रहते हैं। लेकिन बदलते भारत में एक स्कूल ऐसा भी है, जहां दाखिले के लिए फीस नहीं देनी होती, बल्कि छात्र सिर्फ एक पौधा देकर दाखिला ले सकते हैं। यह स्कूल है छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में।


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स्कूल की खास बात यह है कि फीस के रूप में बच्चे के नाम पर एक पौधा रोपा जाता है, जिसके देखभाल की जिम्मेदारी बच्चे के माता-पिता की होती है। इस स्कूल में यूनिफॉर्म, कॉपी-किताबें निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती है। अंबिकापुर से 20 किलोमीटर दूर बरगईं गांव में स्थित इस स्कूल का नाम है शिक्षा कुटीर।

अभिभावक को करना होता श्रमदान

इस स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों को श्रमदान करना होता है। दरअसल, फीस के रूप में जिन पौधों को लगाया जाता है, उनके देखभाल की पूरी जिम्मेदारी अभिभावकों की होती है। यही वजह है कि यहां स्कूल के आसपास कई पौधे लहलहा रहे हैं।

छत्तीसगढ़ का पहला बैगलेस स्कूल

यहां बैग लेकर स्कूल जाने की परम्परा नहीं है। बच्चों का बैग, उनकी किताबें और कॉपियां सब स्कूल में ही रख लिया जाता है। स्कूल हफ्ते में केवल पांच दिन ही खुलता है। स्कूल की प्राचार्य जानसी सिन्हा कहती हैं कि बच्चों को सिर्फ स्लेट और पेन्सिल घर ले जाने की अनुमति है।

किताबें, यूनिफॉर्म मुफ्त



इस स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों को न केवल किताबें, बल्कि यूनिफॉर्म भी मुफ्त में मुहैया कराई जाती हैं। इस संस्था से रायपुर, बिलासपुर और अंबिकापुर के कई युवा जुड़े हैं। स्कूल की एक वेबसाइट और फेसबुक पेज है, जिनके माध्यम से यहां की गतिविधियां सार्वजनिक होती हैं। इसकी वेबसाइट पर दान-दाताओं की पूरी जानकारी और खर्च का ब्यौरा उपलब्ध है।

अंग्रेजी बोलने लगे हैं बच्चे

जानसी सिन्हा का कहना है कि बच्चे अब अंग्रेजी में अभिवादन करना सीख गए गैं। सिर्फ छह महीने में ही यहां के बच्चे अंग्रेजी अल्फाबेट, व 1 से 100 तक गिनती बोलना और लिखना सीख चुके हैं।

पहले साल लिया 26 बच्चों ने दाखिला

इस स्कूल में पहले ही साल 26 बच्चों ने दाखिला लिया है। आसपास के लोगों में इस स्कूल को लेकर उत्सुकता जग रही है। माना जा रहा है कि अगले साल यहां अन्य अभिभावक भी अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजना शुरू करेंगे।

पर्यावरण बचाने की दिशा में अभिनव प्रयोग


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इस इलाके में शिक्षा के क्षेत्र में चल रहे इस अभिनव प्रयोग की सर्वत्र सराहना हो रही है। इस कोशिश को आध्यात्मिक राष्ट्रवाद की संज्ञा दी जा रही है। यहां न केवल बच्चों को शिक्षा मिल रही है, बल्कि पर्यावरण बचाने की दिशा में सार्थक प्रयास भी हो रहा है।

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