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बाबा नागार्जुन: यह जनकवि न हुआ, कालजयी हो गया!

Published on 5 November, 2017 at 12:29 pm By

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बाबा अगर आज ज़िंदा होते तो शीर्षक पढ़कर ठहाका लगाकर हंसते!

जनता का ये कवि जिस बेबाकी और बेफिक्री से अपनी बात कविता में पिरोता था, वह आज तो क्या उस जमाने में भी दुर्लभ बात थी। इनका जीवन और इनकी रचना दोनों ही इनकी यायावरी और फक्कड़पन का सबूत देते हैं। जनता की ओर से देश-सत्ता तक को ललकारने वाला यह ‘यात्री’ 5 नवंबर 1998 को ही अपनी अनंत यात्रा पर निकल चुका था।

तत्कालीन दरभंगा जिला के तरौनी गांव में वर्ष 1911 में जन्में हिन्दी के इस सशक्त कवि का वास्तविक नाम वैद्यनाथ मिश्र है। इन्होंने हिन्दी के साथ-साथ अपनी मातृभाषा मैथिली में भी ‘यात्री’ उपनाम से रचनाएं की। इन्हें मैथिली काव्य संग्रह ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

नागार्जुन के पास भाषा के प्रयोग की जादूगरी थी। घनघोर संस्कृतनिष्ठ भाषा से लेकर निहायत बोलचाल की भाषा तथा आंचलिकता उनकी कविताओं को कालजयी बना गया। उनकी रचनाओं में हिन्दी जितने बहुरूप में उपस्थित है, शायद किसी रचनाकार ने ये जहमत उठाई हो। उनकी हिन्दी बंगाल की भी हो सकती है, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, मिथिला या पंजाब की भी। हिन्दी में साहित्य लिखकर लोगों के इतने निकट जाने वाले विरले कवि हुए, नागार्जुन उन्हीं में से एक हैं।

तत्कालीन प्रतिक्रियात्मक रचनाएं कालजयी नहीं हो पाती, लेकिन नागार्जुन की रचनाएं जनसरोकारों से इतनी लबालब थी कि कालजयी बन गई। अकाल की त्रासदी पर उनकी ये पंक्तियां आज भी आपको खींच लेंगी।

“कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास। कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास।
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त। कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त।
दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद। धुआं उठा आंगन के ऊपर कई दिनों के बाद।
चमक उठी घर-घर की आंखें कई दिनों के बाद। कौवे ने खुजलाई पांखें कई दिनों के बाद।”



सब उसी की चर्चा करते हैं, जो प्रभावशाली होते हैं। लेकिन नागार्जुन अकेले ऐसे कवि हैं जिन्होंने टूटे और जीवन की आपाधापी में छूटे लोगों को भी याद किया।

“जो नहीं हो सके पूर्णकाम / मैं उनको करता हूं प्रणाम / कुछ कुंठित और कुछ लक्ष्य भ्रष्ट / जिनके अभिमंत्रित तीर हुए / रण की समाप्ति के पहले ही / जो वीर रिक्त तूणीर हुए / उनको प्रणाम जो छोटी सी नैया लेकर / उतरे करने को उदधि पार / मन की मन में ही रही / स्वयं हो गए उसी से निराकार / उनको प्रणाम…”

नागार्जुन साहित्य को लिखते ही नहीं थे, जीते थे। राजनीतिक हलकों में उनकी कविताएं हडकंप मचाती थी। वे सीधे नाम लेकर कविता लिखते थे। साठ के दशक में जब शासन से जनता का मोहभंग हो रहा था तब वे -‘आओ रानी, हम ढोएंगे पालकी, यही हुई है राय जवाहरलाल की’ जैसी कविता लिखते है। वे आगे लिखते हैं- ‘लाल बहादुर लाल बहादुर, मत बनना तुम गाल बहादुर।’ राजनीति में उनका यह प्रत्यक्ष हस्तक्षेप इंदिरा गांधी और बाल ठाकरे तक दिखाई पड़ता है।

वह फासीवाद की बिल्कुल खिल्ली उड़ाते हैं। इसी बेबाकी के कारण इमरजेंसी के दिनों उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। आप उनकी ‘शासन की बंदूक’ कविता देख सकते हैंः


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“खड़ी हो गई चाँपकर कंकालों की हूक / नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक
उस हिटलरी गुमान पर सभी रहें है थूक / जिसमें कानी हो गई शासन की बंदूक
बढ़ी बधिरता दस गुनी, बने विनोबा मूक / धन्य-धन्य वह, धन्य वह, शासन की बंदूक
सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक / जहाँ-तहाँ दगने लगी शासन की बंदूक
जली ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक / बाल न बाँका कर सकी शासन की बंदूक”

जनता के लिए कविताई की जो विशाल रेखा इन्होंने खिंची है, उसके सामने अन्य सभी रेखाएं छोटी पड़ जाती हैं। कविताओं के अलावे उनके रतिनाथ की चाची, बलचनमा, बाबा बटेसरनाथ जैसे उपन्यास भी खासे चर्चित हुए। हिन्दी-मैथिली के साथ ही उन्होंने संस्कृत और बांग्ला में भी रचनाएं की। ऐसे कालजयी रचनाकार को हमारा नमन!

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