अवध का आख़िरी नवाब था यह शख्स, गहने बेचकर होता था गुजारा

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Updated on 7 Nov, 2017 at 11:36 am

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खुद को अवध का आख़िरी नवाब बताने वाले प्रिंस अली रजा उर्फ साइरस आज इस दुनिया में नहीं हैं। उन्होंने अपनी ज़िंदगी एक अलग ही गुमनाम दुनिया में बिताई और अब उनकी मौत भी गुमनामी में ही हुई। जानने वालों के मुताबिक आधी से ज्यादा जिंदगी गुमनामी में बिताने वाले इस अवध के नवाब की एक महीने पहले मृत्यु हो गयी थी। 

जानकारों के मुताबिक, प्रिंस अली रजा राजकुमारी सकीना के साथ दिल्ली के मालचा महल में रहा करते थे। अब यह महल पूरी तरह से खंडहर हो चुका है। अली रजा की गुमनाम ज़िंदगी इस कदर बदहाल थी, जिसका अंदाज़ा मालचा महल को देख कर लगाया जा सकता है। खंडहर हो चुके इस महल में न ही पानी की व्यवस्था है और न ही बिजली की सुविधा।

12 कुत्तों के साथ इस महल में रहा करते थे नवाब

प्रिंस अली रजा मालचा महल में राजकुमारी सकीना और 12 कुत्तों के साथ रहा करते थे। मालचा महल सेंट्रल रिज के घने जंगलों के बीच में स्थित है। प्रिंस अली रजा के तंगहाली का आलम यह था कि उनके पास कोई गाड़ी नही थी। नवाब साइकल से चला करते थे। इतना ही नहीं, प्रिंस राजकुमारी सकीना के गहने बेचकर कुत्तों के लिए हड्डी और अपने लिए खाना लेकर आते थे। कहा जाता है कि प्रिंस अली रजा और राजकुमारी सकीना की शादी काफी कम उम्र में ही हो गई थी।

तंगहाली के बावजूद देसी घी में खाना खाते थे प्रिंस

प्रिंस अली रजा इतनी गरीबी होने के बाद भी देसी घी में खाना खाते थे। ग़रीबी का आलम ये था कि उनके पास सोने के लिए कोई बेड भी नही था। वह ज़मीन पर कालीन बिछा कर सोते थे। आपको बता दें मालचा महल को मुस्लिम शासक फिरोजशाह तुगलक ने बनवाया था। इतिहासकार बताते हैं कि तब मुगल शासक इस महल को शिकारगाह की तरह इस्तेमाल करते थे।

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1975 में दिल्ली आया था प्रिंस का परिवार

भारत में रियासतों के विलय के बाद अवध राजघराने की बेगम विलायत महल 1975 में 12 कुत्ते, नैपाली नौकर, बेटी सकीना महल और बेटे अली रजा के साथ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन आई थी, जिससे जुड़ी एक कहानी बड़ी दिलचस्प है।



जानकार बताते हैं कि बेगम जब दिल्ली आई थी, तब वह करीब 10 साल तक नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के वीआईपी लाउंज में रहीं और भारत सरकार से कई सारी चीजों की मांग को लेकर धरना देना शुरू कर दिया। जब उन्हें धरना से हटाने की कोशिश की जाती थी, तब वे उन पर कुत्ते छोड़ देती थी और जहर पी कर जान देने की धमकी देती थीं।

आखिरकार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उनसे मिलने रेलवे स्टेशन पहुंची और 1985 में भारत सरकार ने बेगम विलायत महल को उसका मालिकाना हक दे दिया। उन्होंने भारत सरकार से पेंशन की भी मांग की थी, लेकिन सरकार ने उससे साफ इंकार कर दिया था।


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