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मिलिए इस नन्हीं उड़नपरी से जो झोपड़ी से निकल कर जीत चुकी है 19 स्वर्ण पदक

Published on 29 July, 2016 at 11:57 pm By

प्रतिभा किसी महलों की मोहताज नही होती है। अगर आप में सच्ची हुनर है, तो उसके दम पर बड़े से बड़े शिखर को हासिल कर सकते हैं। कुछ ऐसी ही कहानी भारत की इस बेटी की है, जिसने टूटे-फूटे झोपड़ीनुमा मकान से उड़ने का साहस पाला। इस लड़की ने अपने हुनर, मेहनत और जज्बे से एथलेटिक्स में अपना ही नहीं, वरन पूरे समाज का नाम रोशन किया। यह बेटी आज पीटी ऊषा की तरह ‘उड़नपरी’ के नाम से भी जानी जाती है।

मिलिए राजस्थान के सांवली रोड सीकर से आई बेहद ग़रीब और पिछड़े बावरिया समाज की सरिता से, जो इस छोटी सी उम्र में अब तक 19 गोल्ड मेडल सहित ढाई दर्जन पदकों पर कब्जा जमा चुकी है।

छोटी सी उम्र में तीन बार राष्ट्रीय स्तर तक अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी सरिता का बचपन बेहद कठिनाइयों में गुजरा है। घर की हालत का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि तंगी के कारण उसे अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी। हालांकि, जब से उसने अपना भविष्य खेल में संवारने की ठानी है, अब दोबारा स्कूल में दाखिला भी मिल चुका है।


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सरिता के अनुसार उसके घर का खर्च मां के खेतों में मज़दूरी करने से चलता है। सरिता के पिता को गलत आदतों की लत है। इस वजह से वह बेरोज़गार हैं। हौसले और जज़्बे से भरी सरिता के अनुसार यदि मन में मजबूत इच्छा शक्ति हो, तो मुसीबतों को हराया जा सकता है। बस इसी आत्मविश्वास ने आज उसको एक अलग मुकाम पर लाकर खड़ा किया है।

सरिता का सपना ओलंपिक तक पहुंचना और वहां भी स्वर्ण पदक जीतना है, लेकिन छह भाई-बहनों में सबसे बड़ी होने के कारण ज़िम्मेदारियां इस नन्हे उम्र में ज़्यादा है। कठिन हालत के बावजूद वह इसे निभाने में बखूबी कुशल है।

सरिता नियमित रूप से सुबह-शाम तीन से पांच किलोमीटर की दौड़ लगती हैं और अभ्यास करती है।

जीतने की ललक जो अब आदत बन चुकी है



2013 से एथलेटिक्स में मैदान पर उतरने वाली सरिता मध्य प्रदेश, झारखंड व पटना में आयोजित हुई राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग ले चुकी है।

वहीं, राज्य व जिला स्तरीय टूर्नामेंट में 19 गोल्ड सहित ढाई दर्जन पदक हासिल कर चुकी है। सरिता 100, 200, 400 व तीन से पांच हजार मीटर के दौड़ प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती है।

पीटी ऊषा से हो चुकी है सम्मानित

जयपुर में आयोजित राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में बेहतरीन प्रदर्शन कर सरिता अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी पीटी ऊषा से सम्मानित हो चुकी है। यही वजह है कि साथी खिलाड़ी सरिता को उडऩपरी कहकर बुलाने लगे हैं।

भाई को मानती हैं प्रेरणा


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सरिता का भाई झाबरमल भी वालीबॉल में उच्य स्तर तक खेल चुका है। दुर्भाग्य से उसके एक हाथ में अंगुलियां नहीं हैं। सरिता ने बताया कि जब वह खेल में इतना आगे जा सकता है, तो मैं क्यों नहीं। बस यही बात हमेशा सरिता को प्रेरित करती रहती है।

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