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चोट लगी तो इलाज नहीं करा सका यह एथलीट, अब बच्चों को देता है मुफ्त में ट्रेनिंग

Published on 16 May, 2016 at 6:04 pm By

22 साल का राष्ट्रीय एथलीट कभी 21 मेडल जीत चुका था। लेकिन मामूली चोट और धन की कमी की वजह से वह आगे नहीं बढ़ सका। इस एथलीट ने अब भी हार नहीं मानी है और फिलहाल बच्चों को मुफ्त में ट्रेनिंग देता है।


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वह जब 13 साल का था, तब 20 साल की उम्र के एथलीट उसकी प्रतिभा का लोहा मानते थे। 100 मी. की दौड़ में उसकी उसके कदमों की फुर्ती बिजली जैसी होती, वहीं जब वह लम्बी कूद के लिए उछाल भरता तो देखने वाले उसकी तुलना चीते से करते।

वह बिना किसी ट्रेनिंग व सुविधा के दो बार राष्ट्रीय स्तर तक खेल आया। उसने 19 साल की उम्र तक 21 मेडल जीते। अपनी छलांग से वह पैसों की कमी को लांघकर राष्ट्रीय स्तर तक खेला लेकिन एक चोट ने ना केवल उसके सपनों को तोड़ा, बल्कि उसकी जिंदगी ही बदल दी।

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अब वह सुबह शाम अपने ही गांव के बच्चों को एथलेटिक्स की ट्रेनिंग देता है। घर चलाने के लिए महज 22 साल के इस राष्ट्रीय खिलाड़ी को एक विद्यालय में पढ़ाने जाना पड़ता है।

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हम बात कर रहे हैं राष्ट्रीय खिलाड़ी महेश नाथ दूबे की। अपने घर की विषमतम् परिस्थितियों के बावजूद महेश ने दो बार राष्ट्रीय स्तर तक के खेलों में हिस्सा लिया।

महेश की लगन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बेहद प्रशिक्षण वाले खेल ट्रिपल जंप (त्रिकूद) में राष्ट्रीय स्तर पर रजत पदक प्राप्त किया। इस कूद की तैयारी के लिए खिलाड़ियों को किसी काबिल कोच से ट्रेंनिग लेनी होती है लेकिन एकलव्य महेश ने किताबों में पढ़कर यह कूद सीखी और अपनी लगन से राष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीता।

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महेश बताते हैं:

”खेल ही मेरा पहला और आखिरी प्यार है। मैं देश के लिए खेलना चाहता था लेकिन मेरा सपना नहीं पूरा हो सका। मैंने देखा कि मेरे गांव के बच्चे मेहनत करते रहते हैं तो मुझसे रहा ना गया और अब मैं इनको ट्रेनिंग देता हूं। मैं भले ही देश के लिए नहीं खेल सका लेकिन इन बच्चों को ट्रेनिंग यही सोचकर देता हूं कि हो सकता है एक दिन ये बच्चे देश का नाम रोशन करें और वहां तक जाएं जहां मैं नहीं पहुंच सका।”



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आगे न खेल पाने की कसक महेश के मन में अभी भी है, वह कहते हैं:

“मैंने बहुत हाथ-पांव मारे बहुत लोगों से मिला, कई पत्रकार आए लेकिन मेरी उपलब्धियों के बखान के अलावा कुछ नहीं किया। मदद के लिए कोई आगे नहीं आया। मैंने अपने क्षेत्र के नेताओं से भी मिलने की कोशिश की लेकिन असफल रहा।”

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महेश याद करते हैं, जब वह दूसरी बार राष्ट्रीय स्तर पर खेलने गए थे, तो वह चोटिल थे:

”समझ में नहीं आ रहा था किससे कहूं मुझे रात भर नींद नहीं आई, खेल शुरू हुआ मेरे पैरों में इतना भयंकर दर्द था कि खड़ा हो पाना भी मुश्किल था। मैं दौड़ा लेकिन चोट ने नतीजा पहले ही तय कर रखा था।”

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महेश के मुताबिक, अब भी समय है। अगर वक्त पर सरकारी मदद मिली तो वह अपने चोटिल पैर का इलाज करा सकेंगे, तो देश के लिए जरूर खेलेंगे।


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