अटलजी से जुड़ी वो 7 बड़ी बातें, जिन्होंने उन्हें बेहद खास बना दिया और वह सबके चहेते बन गए

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Updated on 17 Aug, 2018 at 4:19 pm

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एक नेता जिसने विरोधियों को भी अपना मुरीद बनाया, ऐसे व्यक्तित्व वाले राजनेता थे अटल बिहारी वाजपेयी। अटलजी ने न केवल देश के लोगों का दिल जीता, बल्कि विरोधियों के दिल में भी अपनी जगह बनाई। अटल बिहारी वाजपेयी के निधन पर पूरे देश में शोक की लहर है। हर कोई उन्हें उनके भाषणों, कविताओं और कई सुने-अनुसुने किस्सों आदि के जरिए याद कर रहा है।

‘भारत रत्न’ अटलजी को हमेशा एक महान राजनेता, शानदार वक्ता, और व्यापक दृष्टिकोण वाले नेता के रूप में याद किया जाएगा। देश की राजनीति के सबसे करिश्माई और लोकप्रिय चेहरों में से एक वाजपेयी ने देशहित और मातृभूमि के लिए कई अटल फैसले लिए।

 

अटल विहारी वाजपेयी ने छह दशक तक सक्रिय राजनीति की, अनेक पदों पर रहे, केंद्रीय विदेश मंत्री से लेकर तीन बार देश के प्रधानमंत्री भी रहे। आम व्यक्तित्व और आम जनता से जुड़े रहने कि कला ने उन्हें हमेशा दूसरों से भिन्न रखा। आइए जानते हैं उनसे जुड़ी कुछ बातें, जिन्होंने उनको आम रहते हुए भी खास बना दिया।

 

नरम दिल के साथ-साथ अपने इरादों के ‘अटल’ भी

 

जहां अभी हम और राजनेता भारत और पाक के रिश्ते कभी ठीक होंगे या नहीं, इसकी बहस में लगे रहते हैं, वहां अटलजी के कार्यकाल में ही पाकिस्तान से बातचीत का एक सिलसिला शुरू हुआ था। उस वक्त प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ही थे, जिन्होंने पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध स्थापित करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया।

अटलजी जी ने एक बार कहा था कि दोस्त बदले जा सकते हैं, पड़ोसी नहीं। अपनी इसी बात का पालन करते हुए उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच बस सेवा की शुरुआत कर पाक से दोस्ती का हाथ बढ़ाया था। इस रिश्ते को नया आयाम देने के लिए वह खुद पहली बस में सवार हो लाहौर गए, लेकिन पाकिस्तान अपनी हरकत से बाज नहीं आया और उसने पीठ में छुरा घोपने जैसा काम किया। पाक ने भारत के कुछ इलाकों पर कब्जा करने का प्रयास किया। वाजपेयी सरकार ने इस का मुंह तोड़ जवाब दिया और कारगिल की लड़ाई में जीत हुई।

जात-पात की राजनीति से ऊपर विकास की राजनीति पर दिया जोर

 

अटलजी ही थे जिन्होंने धर्म, जात-पात क्षेत्र की राजनीति से हटकर विकास की राजीनीति पर जोर दिया। इसके लिए उन्होंने कई कदम उठाये। अटलजी के कार्यकाल में देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई। उस वक्त आर्थिक वृद्धि दर बढ़कर 6-7 फीसद तक हो गई। ये अटलजी कि विदेश नीतियों का ही नतीजा रहा कि देश में विदेशी निवेश बढ़ा, आधारभूत सुविधाएं बढ़ीं और भारत एक आईटी सुपरपॉवर के रूप में भी उभरकर सामने आया।

यही नहीं, भारत की बढ़ती ताकत को देख पहले अमेरिकी राष्ट्रपति क्लिंटन और फिर दूसरे राष्ट्रध्यक्ष ने भारत का दौरा भी किया और तमाम समझौतों पर हस्ताक्षर भी किए।

विरोधियों को साथ लेकर चलने की कला में माहिर


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अटल बिहारी वाजपेयी भारत के उन चुनिंदा नेताओं में से एक रहे, जिन्हें सत्ता पक्ष और विपक्ष में बराबर का सम्मान प्राप्त हुआ। अटलजी ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के पहले प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री पद के 5 साल बिना किसी समस्या के पूरे किए। उन्होंने 24 दलों के गठबंधन से ये सरकार बनाई थी। 24 दलों के गठबंधन की सरकार को चलाना बिलकुल भी आसान नहीं था, लेकिन ये अटलजी का ही जादू था कि इतने बड़े गठबंधन के बावजूद किसी दल का उनसे मतभेद नहीं रहा।

प्रतिबंधों के दबाव में नहीं आए अटल

 

अटल सरकार ने कई ऐसे काम किए जो अपने आप में मिसाल बन गए। वाजपेयी सरकार ने 1998 में परमाणु परीक्षण किए। कई देशों ने अमेरिका की अगुवाई में देश पर तमाम प्रतिबंध लगा दिए, लेकिन अटल सरकार के कारण इनका कोई भी असर देश के जनमानस पर नहीं हुआ।

हिंदी प्रेम ऐसा कि संयुक्त राष्ट्र में भी दिया हिंदी में ही भाषण

 

अटलजी को हिंदी भाषा से काफी लगाव रहा। 1977 की जनता सरकार में विदेश मंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र संघ हिंदी में भाषण देकर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया था। कहा जाता है कि वाजपेयी धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते थे, लेकिन संयुक्त राष्ट्र में अपने भाषण के लिए उस वक्त हिन्दी के चयन के पीछे उनका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय पटल पर हिन्दी को उभारना था और वह अपने उस उद्देश्य में कामयाब भी रहे।

अटलजी का हिंदी में दिया भाषण उस वक्त काफी लोकप्रिय हुआ। उनका यह भाषण यूएन में आए सभी प्रतिनिधियों को इतना पसंद आया कि उन्होंने खड़े होकर अटल जी के लिए तालियां बजाई।

महान वक्ता

 

अटलजी को शब्दों का जादूगर माना गया। विरोधी भी उनके बोलने के लहजे, उनकी  शब्दावली और तर्कों के कायल रहे। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि 1994 में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत का पक्ष रखने की जिम्मेदारी विपक्षी नेता अटलजी को सौंपी। ये अपने आप में विचित्र था कि सत्ता में रही कांग्रेस सरकार ने अपनी पार्टी के किसी नेता को नहीं, बल्कि विपक्ष के नेता को इतने बड़े मंच के लिए चुना।

राजनीति के धुर विरोधी भी अटल जी के कायल रहे

 

राजनीति में अटलजी के धुर विरोधी भी उनकी विचारधारा और कार्यशैली के कायल रहे। राजनीतिक जीवन में उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे। कई बार उनकी आलोचनाएं भी हुईं, बावजूद उन्होंने खुद को संयमित बनाए रखा। यही कारण है कि सदन में जब भी वो अपनी बात रखते थे तो विपक्षी भी उन्हें बहुत ध्यान से सुनते थे। आज की तरह शोर-शराबा नहीं होता था। साथ ही उनकी बातों का सम्मान और समर्थन भी करते थे। अटल जी का कभी किसी राजनेता से कोई निजी विवाद नहीं रहा। उन्होंने देश की राजनीति को विकास कि राजिनीति से जोड़ा।

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