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मजहब के नाम पर लड़ने वालों के लिए सौहार्द्रता की मिसाल हैं आरिफ भाई

Published on 31 January, 2017 at 6:08 pm By

“ऊपरवाला एक ही है। हम सब उसके बंदे भी एक हैं। मज़हब के नाम पर लड़ाई कराने वालों ने बहुत तकलीफ़ पैदा की हुई है, जबकि हम सबको चाहिए कि मिलजुल कर रहें


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समाज में सभी को मिलजुल कर चलने की नेक राय देने वाले आरिफ़ भाई की बड़ोदा में तालों की दुकान है, लेकिन इन्हीं तालों से वह मजहबी भाईचारे को महफूज करने की कोशिशों में लगे हैं। उनकी सोच बड़ी और नेक है। वह सभी धर्म के ‘ऊपरवाले’ को एक मानते हैं। वह दीन के काम के लिए ताला खरीदने आए ग्राहकों से कोई पैसे नहीं लेते।

मंदिर मस्जिद के लिए पैसे नहीं लेने वाले आरिफ़ भाई की कहानी हिमांशु कुमार ने फेसबुक पर एक पोस्ट के ज़रिए शेयर की है, जो अब वायरल हो रहा है। हिमांशु कुमार ने लिखा हैः

“कुछ समय पहले की बात है मैं ताला खरीदने के लिए बड़ौदा के बाजार में गया था, दुकान एक मुस्लिम व्यक्ति की थी, जिनका नाम है आरिफ़ भाई। मेरे साथ मेरे बहनोई भी थे।”

दरअसल, इस ताले की दुकान के पास से गुजरते वक़्त हिमांशु के बहनोई को याद आया की उन्हे एक ताला अपनी माता जी (सास) के लिए लेना है, तो उन्होंने हिमांशु से कहा की माताजी के घर के लिए एक ताला ले लेते हैं। यह सुनकर आरिफ़ भाई ने जवाब दियाः



“मंदिर या मस्जिद के लिए आप को जितने भी ताले लेने हैं, मैं उनका कोई पैसा नहीं लूंगा” इसका अर्थ पूछने पर आरिफ़ भाई आगे कहते हैं कि ‘अगर कोई भी मंदिर या मस्जिद के लिए मुझसे ताला खरीदता है तो मैं किसी से कोई पैसा नहीं लेता। माताजी के लिए आप जितने भी ताले लेंगे उसका कोई पैसा नहीं लूंगा।”

आरिफ़ भाई से बात करने पर पता चला कि आज सुबह ही एक मंदिर वाले दर्ज़न भर ताले आरिफ़ भाई की दुकान से ले गए हैं, जिनके लिए आरिफ़ भाई ने उनसे कोई पैसा नहीं लिया। हिमांशु अपनी पोस्ट में लिखते हैं कि आरिफ़ भाई की बराबर वाली दुकान एक हिंदू की है, जिसका नाम महालक्ष्मी बेल्ट है। पड़ोसी दुकानदार भी कहते हैं कि यह सच है आरिफ़ भाई सालों से ऐसा करते आ रहे हैं। वे मंदिर और मस्जिद के लिए ताले के पैसे नहीं लेते हैं।


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फिर हिमांशु अपना और अपने बहनोई का परिचय आरिफ़ भाई से कराते हैं और समझाने की कोशिश करते हैं कि उन्हें ताला अपनी सास के लिए खरीदना है, जिनको वो ‘माताजी’ के नाम से संबोधित कर रहे। तो आरिफ़ भाई कहते हैंः

“ऊपरवाला एक ही है, हम सब उसके बंदे भी एक हैं, यह मज़हब के नाम पर लड़ाई कराने वालों ने बहुत तकलीफ़ पैदा की हुई है, लेकिन हम सबको  मिलजुल कर रहना चाहिए।”

आरिफ़ भाई से प्रभावित होकर जब उनकी तस्वीर लेने की बात कही गई तो उन्होंने शरमाते हुए कहाः ‘मैं तो एक छोटा सा इन्सान हूं, मेरी फ़ोटो का क्या कीजिएगा?’


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सच तो यह है कि आरिफ़ भाई आप जैसे इंसान कभी छोटे हो ही नहीं सकते। आपके विचार हमेशा समाज को सुगंधित करते रहेंगे।

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