अन्ना का आंदोलन भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन इसने कई सवाल खड़े किए हैं

author image
Updated on 30 Mar, 2018 at 1:54 pm

Advertisement

अन्ना हजारे का आंदोलन खत्म हो गया है। पिछले सात दिनों से चल रहा यह आंदोलन गुरुवार की शाम को खत्म हुआ। अनशन समाप्त करते हुए अन्ना हजारे ने दावा किया कि सरकार ने उनकी मांगें मान ली हैं। हालांकि, अन्ना ने इसके लिए कोई समयावधि नहीं बताया, क्योंकि सरकार ने इसकी कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की है। अन्ना ने यह जरूर धमकी दी कि अगर सरकार अगले छह महीने में उनकी मांगों पर कार्रवाई नहीं करती है तो वह फिर से भूख हड़ताल करेंगे।

 

 

अन्ना हजारे इसे अपनी जीत बता रहे हैं।

 

हालांकि, इस आंदोलन को इस तरह से समाप्त किए जाने से कई सवाल खड़े हो गए हैं। यह सवाल खुद अन्ना के साथ खड़े दिखे किसान उठा रहे हैं।

इस रिपोर्ट में किसान नेता काकाजी के हवाले से बताया गया है कि मांगों को केवल सरकारी आश्वासन से निपटा देना दरअसल किसानों के साथ विश्वासघात है। किसानों की नाराजगी इस बात को लेकर भी है कि अन्ना ने अपना आंदोलन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस के साथ मुलाकात के बाद खत्म किया। इससे यह संदेश जाता है कि यह आंदोलन किसानों के देशव्यापी हित को लेकर नहीं, बल्कि सिर्फ महाराष्ट्र के किसानों के लिए था।

 

फीका रहा अनशन

 

 

अन्ना हजारे के इस आंदोलन की तुलना वर्ष 2011 में दिल्ली व मुंबई के आंदोलनों से अगर किया जाए तो इसे फीका करार दिया जाएगा। इस आंदोलन में वह जोश नहीं था, जिसके लिए अन्ना हजारे और उनकी टीम जानी जाती है। आम लोगों को इस आंदोलन से कोई फर्क नहीं पड़ा, वहीं आंदोलन में शामिल किसान भी उत्साहित नजर नहीं आए। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस बार रामलीला मैदान में करीब 6 हजार लोग अन्ना के समर्थन में नजर आए। ये सभी लोग उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश व असम सऱीखे राज्यों से लाए गए थे। आंदोलन भले ही राजधानी दिल्ली की हृदयस्थली पर हो रहा था, लेकिन इससे दिल्ली वालों कोई लेना-देना नहीं था। न तो मीडिया में इस आंदोलन की चर्चा हुई। कुल मिलाकर किसानों को भी अब इस बात का भरोसा नहीं है कि सरकार अन्ना की मांगों पर गौर करने जा रही है।


Advertisement

 

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि मजबूरी में तो अन्‍ना ने आंदोलन खत्‍म नहीं किया। ऐसा मानने की अपनी वजह भी है।

 

 

अन्‍ना ने जिन मांगों को लेकर केंद्र सरकार द्वारा हामी भरने की बात कह रहे हैं, वे मांगें तो खुद केंद्र सरकार काफी पहले ही मान चुकी है। अन्ना की मांग है कि कृषि उपज की लागत के आधार पर डेढ़ गुना ज्‍यादा दाम (MSP) मिले। खुद भारतीय जनता पार्टी ने वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में अपने घोषणापत्र में वादा किया था कि किसानों को उनकी लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाएगा। वित्त मंत्री के रूप में चौथा बजट पेश करते हुए अरुण जेटली ने यह ऐलान किया था कि सरकार कृषि उपज की लागत के आधार पर डेढ़ गुना ज्‍यादा दाम के अपने वायदे को पूरा कर रही है। ऐसे में अन्ना का दावा कहीं टिकता ही नहीं।

जहां तक लोकपाल की बात है तो केन्द्र सरकार ने पिछले 1 मार्च को लोकपाल की नियुक्ति को लेकर सेलेक्शन कमेटी की बैठक की है। लोकपाल की सेलेक्शन कमेटी में पीएम मोदी, लोकसभा की स्पीकर सुमित्रा महाजन, देश के मुख्य न्यायधीश और लोकसभा में नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल हैं। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार इस मसले पर गंभीर दिख रही है।

 

 

इस बार आंदोलन की एक बड़ी बात यह रही कि केन्द्र सरकार ने इसे कोई तवज्जो नहीं दी, साथ ही इसे विपक्ष का भी साथ नहीं मिला। वर्ष 2011 में जब अन्ना हजारे आंदोलन कर रहे थे, तब तात्कालीन संप्रग सरकार लगातार इस बात का प्रयास कर रही थी कि अन्ना आंदोलन तोड़ दें। यहां तक कि सरकार को अन्ना की मांगों के आगे में झुकना पड़ा था, लेकिन इस बार ऐसा कोई नजारा नहीं दिखा। केन्द्र सरकार इससे दूर ही रही। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अन्ना से बातचीत करने जरूर गए, लेकिन इससे आंदोलन की महत्ता खत्म हो गई।

और तो और विपक्ष भी इस मुद्दे पर अन्ना हजारे से दूर ही रहा। विपक्ष का कोई भी नेता अन्ना हजारे के मंच तक नहीं पहुंचा। यहां तक कि ममता बनर्जी जिन्हें अन्ना का करीबी का कहा जाता है, ने भी अनशन से कन्नी काट ली।

 

 

गौर करने वाली बात है कि जब अन्ना का आंदोलन चल रहा था तब ममता केंद्र सरकार के विरुद्ध मोर्चा बनाने के लिए दिल्ली में जुटी थीं।

अन्ना के अांदोलन से निकले अरविन्द केजरीवाल ने जब अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई थी, तभी राजनीतिक विशेषज्ञों ने कहा था कि आने वाले कई दशकों के लिए इस तरह के जनआंदोलन की विश्वसनीयता खत्म हो गई है। यह सच भी साबित हो रहा है।

Advertisement

आपके विचार


  • Advertisement