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मिलिए ‘नन्हे मास्टरजी’ से जो 800 ग़रीब बच्चों को कर चुके हैं पढ़ने के लिए प्रेरित

Updated on 21 April, 2017 at 6:15 pm By

अक्सर सोचता हूँ कि एक बेहतर कहानी क्या हो सकती है? नायक हमेशा हमारे दिल को क्यों लुभाते हैं? फिर जब इसका जवाब तलाशने के लिए उनकी ज़िंदगी के किताब के पन्नों को पलटता हूं, तो पाता हूं कि वे कहानियां अक्सर ही हमारे दिल के करीब होती हैं, जिनको हम खुद से जोड़ पाते हैं। वे नायक सच्चे लगते हैं, जिनको हम खुद के आस-पास रख पाते हैं। हम उनसे प्रेरित होते हैं, उनके काम की सराहना करते हैं। उनके जैसा बनना चाहते हैं।


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पर यही सवाल अगर हम उस व्यक्ति से पूछें जिसे नायक मान कर हम प्रेरणा हासिल करते हैं, कि इस शिखर तक पहुचने के लिए उन्होंने ख़ास क्या किया? तो जवाब बहुत सरलता से मिल सकता है कि ‘एक बदलाव की चाह’।

कुछ ऐसी ही कहानी है मात्र 12 वर्ष के कक्षा आठ में पढ़ने वाले आनंद कृष्ण मिश्रा की, जिनके एक अथक प्रयास ने उन्हें मेरे नायक की श्रेणी में ला खड़ा किया है।

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12 वर्ष के ‘नन्हे मास्टरजी’ गरीब बच्चों के जीवन में बाल-चौपाल से भर रहे हैं ‘आनंद’

कक्षा 8 में पढ़ने वाले मात्र 12 वर्ष की उम्र के आनंद कृष्ण मिश्रा का सपना है कि देश में कोई भी बच्चा निरक्षर या अनपढ़ न रहे। इसलिए इन्होंने शिक्षा से वंचित दूसरे बच्चों के बीच शिक्षा की अलख जगाने का बीड़ा उठाया है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के नजदीक करीब 144 गांवों के न जाने कितने बच्चे आज इस ‘छोटे मास्टरजी’ और उनकी ‘बाल चौपाल’ के प्रयासों के फलस्वरूप शिक्षित होने में कामयाब हो रहे हैं। आनंद ने वर्ष 2012 में झुग्गियों में रहकर जीवन व्यतीत करने वाले बच्चों को साक्षर बनाने के लिये प्रयास शुरू किया, जिसनें कुछ समय बाद बाल चौपाल का रूप ले लिया।

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आनंद अब प्रतिदिन अपनी व्यस्त दिनचर्या में से एक घंटा निकालते हैं और इन बच्चों को गणित, कंप्यूटर और अंग्रेजी पढ़ाते हैं। पिछले तीन वर्षों में आनंद अपनी बाल चौपाल के माध्यम से करीब 758 बच्चों को स्कूल जाने के लिये प्रेरित कर चुके हैं। अपनी इस बाल चौपाल में आनंद बच्चों को पढ़ाने के अलावा उनकी मनोदशा और माहौल के बारे में भी जानने का प्रयास करते हैं और फिर अपने माता-पिता के सहयोग से वे इन बच्चों को शिक्षा के प्रति जागरूक करते हैं।


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आनंद के पिता अनूप मिश्रा और मां रीना मिश्रा उत्तर प्रदेश पुलिस में कार्यरत हैं और दोनों ही उनके इस अभियान में पूरा सहयोग देते हैं। यह परिवार अपने खाली समय में लोगों को पर्यावरण की अहमियत के बारे में जागरूक करने के साथ-साथ पौधारोपण के लिए प्रेरित करता है।

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एक घटना ने बदल दी ज़िंदगी

आनंद के पिता बताते हैं कि बचपन में महाराष्ट्र में छुट्टियां बिताने के दौरान हुई एक घटना ने उनके बेटे का जीवन ही बदल दिया। अनूप बताते हैंः

‘‘जब आनंद चौथी क्लास में पढ़ रहा था, तब हम घूमने के लिए पुणे गए थे। वहां आनंद ने देखा कि एक बच्चा आरती के समय मंदिर आता और आरती खत्म होने का बाद मंदिर के बाहर चला जाता। बाहर जाकर देखने पर पता चला कि वह बच्चा झुग्गियों में रहता था और वापस जाकर कूड़े के ढेर से उठाकर लाई गई फटी-पुरानी किताबों को पढ़ रहा था।’’

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आनंद ने उस बच्चे को कुछ पैसे देने की कोशिश की, लेकिन उसने पैसों की पेशकश ठुकराते हुए उनसे कहा कि अगर आप मुझे कुछ देना ही चाहते हैं, तो कुछ किताबें और पेन-पेंसिल दे दो, ताकि मैं पढ़ सकूं। इस घटना ने आनंद के बालमन को भीतर तक प्रभावित किया और उसी दिन से इसने ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए प्रयास करने का फैसला किया।

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आनंद का हौसला और लगन देखकर उसके माता-पिता उसे लखनऊ के बाहरी क्षेत्र में कुछ ग्रामीण इलाकों में लेकर गए। वहां जाकर इन लोगों ने पाया कि इन क्षेत्रों में रहने वाले अधिकतर बच्चे पढ़ाई-लिखाई से वंचित हैं और वे सारा दिन इधर-उधर घूमकर ही अपना सारा समय बेकार कर रहे हैं। अनूप बताते हैंः

‘‘प्रारंभ में आनंद ने उस इलाके के कुछ बच्चों को अपने साथ पढ़ने के लिए तैयार किया। धीरे-धीरे समय के साथ इनके पास पढ़ने वाले बच्चों को मजा आने लगा और वे अपने दोस्तों को भी इनके पास पढ़ने के लिए लाने लगे। इस प्रकार ‘बाल चौपाल’ की नींव पड़ी।’’



 

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कैसे पढ़ाते हैं बच्चों को

लखनऊ के LDA कॉलोनी , कानपुर रोड स्थित सिटी मांटेसरी स्कूल में पढ़ने वाले आनंद शाम के पांच बजते ही वह अपनी ‘बाल चौपाल’ लगाने के लिए घर से निकल पड़ते हैं। आनंद कहते हैंः

‘‘मैं बच्चों को पढ़ाने के लिए खेल-खेल में शिक्षा देने का तरीका अपनाता हूं। मैं रोचक कहानियों और शैक्षणिक खेलों के माध्यम से उन्हें जानकारी देने का प्रयास करता हू, ताकि पढ़ाई में उनकी रुचि बने रहे और उन्हें बोरियत महसूस न हो। मुझे लगता है कि इन बच्चों को स्कूल का माहौत भाता नहीं है, इसलिए वे पढ़ने नहीं जाते हैं।’’

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ऐसा नहीं है कि आनंद अपनी इस बाल चौपाल में बच्चों को सिर्फ किताबी ज्ञान ही देते हैं। वे अपने पास आने वाले बच्चों के भीतर देशभक्ति का जज्बा जगाने के अलावा उन्हें एक बेहतर इंसान बनने के लिये भी प्रेरित करते हैं। आनंद बताते हैंः

‘‘हमारी बाल चौपाल का प्रारंभ ‘हम होंगे कामयाब एक दिन’ गीत से होती है और अंत में हम सब मिलकर राष्ट्रगान गाते हैं। मेरा मानना है कि इस तरह से ये बच्चे शिक्षा के प्रति जागरूक होने के अलावा नैतिकता, राष्ट्रीयता और अपने सामाजिक दायित्वों से भी रूबरू होते हैं।’’

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लाइब्रेरी खोलने की है योजना

आनंद को अपनी इस बाल चौपाल के लिये अबतक सत्यपथ बाल रत्न और सेवा रत्न के अलावा कई अन्य पुरस्कार भी मिल चुके हैं। आनंद ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बच्चों को शिक्षा देने के अलावा विभिन्न स्थानों पर उनके लिए पुस्तकालय खोलने के प्रयास भी करते हैं और अबतक कुछ स्थानों पर दूसरों के सहयोग से कुछ पुस्तकालय खोलने में सफल भी हुए हैं।

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आनंद प्रतिदिन आसपास के ग्रामीण इलाकों और मलिन बस्तियों के करीब 100 बच्चों को पढ़ाते हैं। पिछले वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के मौके पर आनंद ने ‘चलो पढ़ो अभियान’ के नाम से एक नए अभियान की नींव डाली है। इस अभियान के माध्यम से उनका इरादा है कि प्रत्येक शिक्षित नागरिक आगे आए और कम से कम एक अशिक्षित बच्चे को शिक्षित करने का बीड़ा उठाए।

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अंत में आनंद एक बात कहते हैंः

‘‘आओ ज्ञान का दीप जलाएं……मेरी बाल चौपाल में पढ़ने वाले अभावग्रस्त बच्चों के सहयोगी बन कर आप सभी अपने जीवन को सफल बना सकते हैं। मलिन बस्ती में रहने वाले बच्चों को स्कूल बैग ,किताब ,कॉपी ,पेंसिल और स्लेट आदि शिक्षण सामग्री भेंट करके उनके अज्ञानता से भरे जीवन में आप भी ज्ञान का दीप जला सकते हैं। सच मानिए आपका एक छोटा सा प्रयास किसी की जिंदगी में बदलाव ला सकता है। आप की दी हुई एक पेंसिल से इन बच्चों को ‘अ’ से अंधकार को मिटाकर ‘ज्ञ’ से ज्ञान प्राप्त करने का अवसर मिल सकता है।’’

आनंद आज नायक है। वो जाने ही कितने ग़रीब बच्चों के प्रेरणा है।

टॉपयप्स टीम की हमेशा यही प्रयास रहता है कि हम अपने आस-पास मौजूद सकरात्मक कहानियों की आवाज़ बने, उन्हे आप तक पहुचाएं, ताकि अच्छाइयों और मानवता की रोशनी से हम एक बेहतर दुनियां की कल्पना कर सकें।


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Origin: SUNO

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