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अमृता प्रीतम: एक महान कवयित्री, जिनके मोहब्बत के अफ़साने आज भी याद किए जाते हैं

Published on 8 March, 2019 at 9:10 pm By

मैं तुझे फिर मिलूंगी, कहां कैसे पता नहीं
शायद तेरे कल्पनाओं की प्रेरणा बन, तेरे केनवास पर उतरूंगी
या तेरे केनवास पर एक रहस्यमयी लकीर बन
ख़ामोश तुझे देखती रहूंगी
मैं तुझे फिर मिलूंगी, कहां कैसे पता नहीं।।

 


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इन पंक्तियों में अमृता की अधूरी मोहब्बत का मुकम्मल अफ़साना छुपा है। अमृता प्रीतम (Amrita Pritam) हिंदी साहित्य का ऐसा नाम जिसे भूल पाना नामुमकिन है। अमृता ने अपने लिए प्यार और आज़ादी का रंग चुना, जो वो हर महिला के जीवन में चाहती थीं। अमृता की दास्तान उनके लेख में छुपी है। जितनी अलहदा अमृता खुद थीं, उतनी ही अलहदा उनकी मोहब्बत। इस मोहब्बत के अफ़साने को हर कोई जानना चाहता है।

 

अमृता प्रीतम का जन्म 31 अगस्त 1919 को पंजाब के गुजरांवाला में हुआ था। उनका बचपन लाहौर में बीता, पढ़ाई भी उन्होंने लाहौर से ही की। छोटी उम्र से ही उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था। अमृता पंजाबी भाषा की पहली कवियित्री थीं। उन्होंने लगभग 100 किताबें लिखी थीं, जिसमें कविता, किताबें और कहानी तीनों का मिश्रण था। अमृता ऐसे कवियों में शामिल हैं, जिनकी रचनाओं का अनुवाद कई भाषाओं में हुआ है।

 

 

ऐसी थीं अमृता

अमृता अपने समय में आगे की सोच रखने वाली महिला थीं। अमृता को अपनी आज़ादी से बेहद प्यार था। वो आज़ाद और खुले विचारों की महिला थीं। अमृता ने ही समाज में लिव-इन कल्चर की शुरुआत की थी। अमृता की शादी 16 साल की उम्र में प्रीतम सिंह के साथ हो गई थी। कुछ दिन तक शादी अच्छे से चली। दोनों के बच्चे भी हुए। लेकिन फिर अमृता के जीवन में मोहब्बत ने दस्तक दी और उन्होंने शादीशुदा जीवन से बाहर निकलने का फ़ैसला किया।


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अमृता के जीवन में साहिर



अमृता के जीवन में मोहब्बत ने साहिर लुधियानवी के रूप में दस्तक दी। साहिर और अमृता की मुलाकात 1944 में एक मुशायरे के दौरान हुई थी। बस तभी से अमृता की बेपनाह मोहब्बत की दास्तान शुरू हुई। अमृता ने इसका ज़िक्र अपनी जीवनी ‘रसीदी टिकट’ में भी किया है। साहिर अक्सर अमृता के घर लाहौर आया करते थे। अमृता की एक कविता है ‘सिगरेट’। ये कविता उन्होंने साहिर से प्रेरित होकर ही लिखी थी।

यह आग की बात है, तूने यह बात सुनाई है
यह ज़िंदगी की वो ही सिगरेट है, जो तूने कभी सुलगाई थी

साहिर चेन स्मोकर थे। अमृता के घर लाहौर में सिगरेट पिया करते थे। साहिर का इश्क अमृता के इस कदर सिर चढ़कर बोला कि साहिर के छोड़कर चले जाने के बाद भी अमृता उनके सिगरेट के बटों को जमाकर रखती थीं और उन बटों को अपनें होठों पर रख साहिर को महसूस करती थीं। अमृता को साहिर की लत थी और साहिर की लत ने अमृता को सिगरेट की लत भी लगा दी। लेकिन साहिर और अमृता का इश्क कभी मुकम्मल नहीं हो पाया। कुछ समय बाद साहिर मुंबई चले गए और उनके जीवन में गायिका सुधा मल्होत्रा आ गईं।

 

 

अमृता के जीवन में इमरोज़

अजनबी तुम मुझे ज़िंदगी की शाम में क्यों मिले,
मिलना था तो दोपहर में मिलते।

कुछ ऐसी ही कहानी थी अमृता और इमरोज़ की। इमरोज़ अमृता के जीवन में काफ़ी देर से आए। दोनों ने साथ रहने का फ़ैसला किया। एक ही छत के नीचे दोनों रहते थे। अमृता रात के अंधेरे और गहरे सन्नाटे में लिखती थीं। इमरोज़ उनके लिए चाय बनाया करते थे। इमरोज़ अमृता के साथ आख़िरी वक़्त तक रहे। जब अमृता का आख़िरी समय चल रहा था तब उनको नहलाना, खिलाना, घुमाना सबकुछ इमरोज़ ही किया करते थे और फ़िर 31 अक्टूबर 2005 को अमृता ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

उसने जिस्म छोड़ा है, साथ नहीं

अमृता के जाने के बाद इमरोज़ ने कभी माना ही नहीं कि अमृता उन्हें छोड़कर चली गई हैं। इमरोज़ का कहना था कि अमृता अब भी उनके साथ हैं। उन्होंने इस पर लिखा था-

उसने जिस्म छोड़ा है, साथ नहीं।
वो अब भी मिलती है, कभी तारों की छांव में,
कभी बादलों की छांव में, कभी किरणों की रोशनी में
कभी ख्यालों के उजाले में हम उसी तरह मिलकर चलते हैं चुपचाप,
हमें चलते हुए देखकर फूल हमें बुला लेते हैं,
हम फूलों के घेरे में बैठकर एक-दूसरे को अपना अपना कलाम सुनाते हैं
उसने जिस्म छोड़ है साथ नहीं

 

 

पद्मविभूषण से भी हुईं सम्मानित


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अमृता प्रीतम ने सौ से भी ज़्यादा कविताओं की किताब लिखी थी। फिक्शन, बायोग्राफ़ी, आलेख और आटोबॉयोग्राफ़ी भी लिखी थी, जिसका कई भारतीय भाषाओं सहित विदेशी भाषाओं में भी अनुवाद हुआ। अमृता प्रीतम पहली महिला लेखिका हैं, जिन्हें 1956 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 1982 में उन्हें ‘कागज ते कैनवास’ के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। 2004 में पद्मविभूषण भी प्रदान किया गया।

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