जिस स्कूल में आंबेडकर ने रखी थी अपनी बुनियादी शिक्षा की नींव, उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं

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Updated on 3 Sep, 2018 at 7:58 pm

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अगर आज बाबा साहेब डॉ. भीम राव आंबेडकर जिंदा होते और सतारा के उसी प्रताप सिंह हाई स्कूल के गलियारों में घूमते, जहां उन्होंने चौथी कक्षा तक पढ़ाई पूरी की थी, तो क्या सोचते? जर्जर होती दीवारें, अध्यापकों की कमी, बुनियादी अभाव से डगमगाता शिक्षा का स्तर क्या बच्चों के भविष्य को अंधेरे में डालने के लिए काफ़ी नही है?

आपको बता दें डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 7 नवंबर 1900 को महाराष्ट्र के इसी सतारा सरकारी स्कूल मे दाख़िला लिया था। आज वहां पढ़ने वाले बच्चों को यह ज़रूर अभिमान है कि वे उसी सरकारी स्कूल में अध्ययन कर रहे हैं जहां बाबा आंबेडकर ने अपनी बुनियादी शिक्षा की नींव रखी थी। हालांकि, उपेक्षा और खराब सिस्टम का शिकार हुए इस एतिहासिक धरोहर को देख कर शर्म के सिवा कुछ महसूस नहीं होता है।

स्कूल की प्रधानाचार्य एस. जी. मुजावर कहती हैंः

“प्रताप सिंह हाई स्कूल में ग़रीब, ज़रूरतमंद तबके से छात्र मेहनत करके सीखते हैं। आंबेडकर की विरासत को हम संरक्षित कर रहे हैं, इसकी हमें खुशी है, लेकिन इस स्कूल को पूर्णकालिक प्रधानाध्यापक की ज़रूरत है। स्कूल बिल्डिंग पुरानी हो चुकी है और जर्जर होती जा रही है। हमें नए बिल्डिंग की ज़रूरत है। स्कूल में छात्रों की संख्या बढ़ाने की हम कोशिश कर रहे हैं।”

यह दिन महाराष्ट्र सरकार द्वारा ज़रूर ”स्कूल प्रवेश दिन” के रूप में मनाया जाता है, लेकिन सवाल फिर भी अधूरा रह जाता है कि क्या किसी महापुरुष को याद कर लेने भर से उनके महान विचार और आदर्शो की पूर्ति हो जाती है?


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आपको बता दें कि सतारा सरकारी स्कूल राजवाडा इलाके में आज भी एक हवेली (वाडा) में चल रहा है। आज भी ये हवेली इतिहास की साक्षी है। इस स्कूल को 1824 में छत्रपती शिवाजी महाराज के वारिस प्रताप सिंह राजे भोसले ने बनावाया था। उस वक्त इस स्कूल को खोलने का मकसद राजघराने की लड़कियों को पढ़ाने का था। 1851 में यह हवेली स्कूल के लिए ब्रिटिश सरकार के हवाले कर दी गई थी।

लोक निर्माण विभाग ने कुछ साल पहले स्कूल की बिल्डिंग को ख़तरनाक बिल्डिंग की श्रेणी में डाल दिया है। मतलब यह बिल्डिंग कभी भी गिर सकती है, जिसकी सुध लेने वाला कोई नही है।

डॉ. आंबेडकर के पिता सुभेदार रामजी सकपाल आर्मी से रिटायर्ड होने के बाद सतारा में बस गए थे। आज इस पुरानी हवेली को ऐतिहासिक धरोहर की तरह ज़रूर देखा जाता है, लेकिन सिर्फ़ इस स्कूल को ऐतिहासिक धरोहर का नाम दे देने से, बिना किसी बुनियादी ढांचे से यहां पढ़ रहे बच्चों का भविष्य सवरने वाला नहीं है। 10वीं कक्षा में पढ़ने वाले विराज महिपती सोनावाले कहते हैंः

“मैं सुबह अख़बार बेचकर स्कूल में पढ़ने आता हूं। उस वक्त मुझे बाबा साहेब का संघर्ष अपनी आंखों के सामने दिखता है। मैं अपने मन में कहता हूं की मेरी मेहनत उनके सामने कुछ भी नहीं। मैं बाबा साहेब के स्कूल में पढ़ता हूं, इसकी मुझे खुशी है। बाबा साहेब की तरह मुझे भी समाज के लिए काम करना है।”

7 नवंबर 1900 को 6 साल के भिवा (आंबेडकर का बचपन का नाम) ने इसी सरकारी स्कूल में दाखिला लिया। सुभेदार रामजी ने स्कूल में दाखिल करते वक्त आंबेडकर का सरनेम आंबडवे गांव के नाम से आंबडवेकर लिख दिया। उस स्कूल में कृष्णाजी केशव आंबेडकर शिक्षक थे। इसके बाद बालक भिवा का सरनेम आंबेडकर कर दिया गया था।

आज भी इस स्कूल के ऐतिहासिक दस्तावेज़ के स्कूल रजिस्टर में बाबा भीमराव अंबेडकर का नाम भिवा आंबेडकर के नाम से दर्ज है। रजिस्टर में 1914 इस नंबर के आगे उनका हस्ताक्षर है। यह ऐतिहासिक दस्तावेज़ स्कूल में संरक्षित करके रखा गया है।

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