नारद मुनि को कहा जाता है ईश्वर का दूत, इनके बारे में जानिए अन्य 20 आश्चर्यजनक तथ्य

Updated on 23 Dec, 2016 at 9:52 pm

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नारद मुनि को युगों से ईश्वर का दूत माना जाता है। साथ ही एक दिलचस्प व्यक्ति भी। अगर आपने टीवी सिरियल में उनको देखा होगा तो उनका व्यक्तित्व, एक पत्रकार एवं जन-संपर्क विशेषज्ञ की तरह ही लगा होगा।

किसी भी जगह उनका आगमन किसी खास उद्देश्य से, उनकी अपनी वीणा एवं नारायण – नारायण के भजन के साथ होता है।

नारद मुनि सही समय पर सही जगह उपस्थित रहने के लिए जाने जाते हैं। हालांकि, उनके संबंध में एक दूसरा पहलू यह भी है कि वह किसी के रहस्य को आत्मसात कर नहीं रख सकते। उनकी चर्चा करने की आदत कई विवादों एवं युद्धों का कारण बनी।

अगर आप उन्हें केवल गपशप या विवाद पैदा करने वाला व्यक्तित्व मान रहे हैं, तो आपको पुनः विचार करना पड़ेगा। नारद मुनि कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, अपितु पुराणों एवं वेदों के महाज्ञाता और एक महान संत हैं।

1. एक साधारण परिचारिका के पुत्र थे मुनि नारद।

नारद मुनि पिछले जन्म में एक साधारण परिचारिका के पुत्र थे और तपस्वियों एवं उपासकों की सेवा करते हुए बड़े हुए थे। प्रबुद्ध तपस्वियों की सेवा करते हुए उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई।

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2. उनका जन्मदिन पत्रकार दिवस के रूप में मनाया जाता है।

उनका जन्मदिन 22 मई को पत्रकार दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसका कारण यह है कि उन्हें दुनिया का प्रथम संदेशवाहक माना जाता है। उन्हें अपनी इच्छा से तीनों जगत की यात्रा करने का वर प्राप्त है।

3. अति प्रिय है अपनी वीणा।

नारद मुनि को आप हमेशा वीणा के साथ देखते हैं। नारद मुनि के पास जब कोई नहीं होता, उस वक्त वह वीणा बजाते हैं और इस जगत के पालनकर्ता भगवान विष्णु का गुणगान करते हैं। पुराने धर्मग्रथों के अनुसार उनकी आवाज बहुत मधुर है।

4. संचार की दुनिया के गुरु।

उनको, उनके अनुयायियों द्वारा, संचार की दुनिया के गुरु के रूप में बहुत श्रद्धा एवं निष्ठा के साथ पूजा जाता है।

5. रामायण की रचना में सहायक।

उन्होंने भगवान विष्णु को शाप देकर रामायण की रचना में सहायता की। उनके द्वारा उच्चारित भगवान राम की कथा एवं रामायण की घटनाओ को सुन कर ही ऋषि वाल्मीकि ने इस महाकाव्य की रचना की थी।

6. भगवान विष्णु के सहायक।

नारद भगवान विष्णु के निष्ठावान सहायक थे। ऋग्वेद के अनुसार वह अक्सर उनके साथ उनके विमान में यात्रा करते देखे जाते थे।

7. नारद का चीनी सम्बन्ध।

ऋग्वेद के अनुसार नारद, हूण देश के निवासी थे, जो दरअसल चीन की सीमा से सटा उत्तराखण्ड है। उत्तराखण्ड के चमोली क्षेत्र में अब भी यह किवदंती मशहूर हैः ‘हूण देश में रहते नारद थोलिंग मठ वाले’।

8. उनके निवास की जगह को थोलिंग कहा जाता है और वह चमोली के पास 12,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।

ऐसा माना जाता है कि नारद मुनि ने भगवान विष्णु के साथ कुछ समय यहां गुज़ारा था।

9. नारद ब्रह्मा जी के पुत्र।

ऐसा कहा जाता है कि वह ब्रह्मा जी के पुत्र थे। उन्हें तथ्यों को रोचक बनाकर बढ़ा-चढ़ा कर बताना अच्छा लगता था। इसीलिए वह पत्रकार एवं जन संपर्क विशेषज्ञ की भूमिका में सफल थे।

10. लोगो में विवाद पैदा करने के दोषी।

नारद मुनि तो मानो उस समय के प्रमाणित गप्पी थे। उन पर लोगों के बीच झगड़ा कराने के आरोप हैं, लेकिन वास्तव में, उनका इरादा कभी भी दुर्भावनापूर्ण नहीं रहा। प्रत्येक जीवित या मृत प्राणी की निःस्वार्थ भलाई ही उनका असली उद्देश्य था।

11. जटिल व्यक्तित्व के स्वामी।

नारद मुनि जटिल व्यक्तित्व के स्वामी कहे जाते हैं और शायद ही कोई उनको समझ सका। वह काफी खुशमिजाज़ और मज़ाकिया प्रतीत होते हैं, लेकिन वास्तव में वह काफी समझदार व शांत थे। उनका चयन भगवान विष्णु के कई कार्य पूरे करने के लिए किया गया था।

12. दिव्य संदेशवाहक।

नारद मुनि हमेशा तीनों लोको में विचरण करते रहते हैं तथा मार्ग में मिलने वाले सभी लोगों से सूचनाओं का आदान-प्रदान करते रहते हैं। वह मनुष्य, देवताओं एवं राक्षसों से सम्बंधित सभी घटनाओं से अवगत रहते हैं। शब्दकल्पद्रुमा के अनुसार, नारद मुनि सभी को ईश्वर की जानकारी देते हैं।

13. जालंधर का नाश।

नारद मुनि ने ही निर्दयी राक्षस राज जालंधर को भगवान शिव के शौर्य एवं पार्वती के सौंदर्य के बारे में बताया। इससे उसमें पार्वती के प्रति लालसा उत्पन्न हो गई और भगवान शिव के द्वारा उसके अंत का रास्ता साफ़ हो गया।

14. 64 विद्याओं के ज्ञाता।

नारद मुनि अपने आप में विशिष्ट थे। अपने विचारों एवं सूचनाओं को अपनी पसंद के अनुसार दूसरों तक पहुंचाना उनकी सबसे बड़ी विशिष्टता थी। वह एक चलते-फिरते विश्वकोष एवं सार संग्रह थे।

15. चिरंजीवियों में से एक।

नारद मुनि को 12 चिरंजीवियों में से एक माना जाता है और यह विश्वास किया जाता है कि वह अब भी जीवित हैं और हमारे बीच ही हैं।

16. भगवान के जानकार।

यह माना जाता है कि नारद मुनि भगवान की सोच व विचारों को जानते हैं। उन्हें ‘भगवान का मन’ भी कहा जाता है।

17. नारद के भक्ति सूत्र।

नारद मुनि द्वारा वर्णित भक्ति सूत्रों पर आधारित किताब की कोई समानता नहीं है। उक्त किताब सुन्दर एवं सरल शब्दों में वर्णित है, जिसे कोई भी साधारण मनुष्य आसानी से समझ सकता है।

18. महाभारत में योगदान।

यह माना जाता है कि नारद मुनि, वनवास में पांडवों के साथ थे। नारद मुनि ने ही युधिष्ठिर को धर्म व सत्य का मार्ग दिखाया।

19. न्यायसंगत जीवन की महत्ता।

नारद मुनि द्वारा मनुष्यों को न्यायसंगत जीवन जीने की महत्ता बताने का श्रेय जाता है। वह भक्ति एवं विश्वास की जरुरत बताने में हमेशा उत्सुक थे।

20. कर्नाटक में नारद मुनि का मंदिर।

कर्नाटक में कृष्णा नदी के चितागेरी गांव में कोरवा नामक टापू को नारादगद्दे के नाम से जाना जाता है।

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