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विश्वविजेता नहीं बन सका था सिकन्दर, पोरस के हाथों हुई थी करारी हार

Published on 17 May, 2016 at 4:07 pm By

मकदूनिया के शासक अलेक्जेंडर को हम भारतीय ‘सिकन्दर’ के नाम से जानते हैं, लेकिन ‘सिकन्दर’ के आगे महान न लगाया जाए, तो लगता है जैसे उसकी शान खतरे में पड़ गई हो। जबकि उसी सिकन्दर को बुरी तरह हराने वाले सिंध नरेश सम्राट पोरस को हमने कभी महान नहीं कहा।

उल्टा भारतीय इतिहासकारों ने बिना किसी शोधकार्य के उसी यूनानी इतिहास को सत्य लिख दिया, जिसमें सिकन्दर को सिंध नरेश पुरु को हराते हुए दर्शाया गया है। जबकि सत्य यह था कि सम्राट पोरस द्वारा सिकन्दर को युद्ध में बुरी तरह हराने के प्रमाण यूनानी ग्रंथों में ही मौजूद हैं।


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आज हम आपको 2300 वर्ष पुराने इतिहास के उन पन्नों की वास्तविकता से रूबरू कराएंगे, जिसे भारतीय जनमानस से छुपा कर रखा गया।

वर्ष 2004 में रिलीज हुई ग्रीक फिल्मकार ओलिवर स्टोन की फिल्म “अलेक्जेंडर” में सिकन्दर की भारत में हार को स्वीकारा गया है। फिल्म में दिखाया गया है कि एक तीर सिकन्दर के सीने को भेद देती है और इससे पहले कि वह शत्रु के हाथ लगता, उसके सहयोगी उसे ले भागते हैं।

इस फिल्म में साफ़-साफ़ कहा गया है कि  यह सिकन्दर के जीवन की सबसे भयानक त्रासदी थी। अंततः भारतीयों ने उसे तथा उसकी सेना को पीछे लौटने के लिए मजबूर कर दिया। फिल्म इस कारण काफी विवादों में भी रही, क्योंकि इसमें एक ऐतिहासिक षड्यंत्र को उजागर किया गया था।

झेलम तट पर हारा था सिकन्दर

जब सिकन्दर ने सिन्धु नदी पार की, तो भारत में उत्तरी क्षेत्र में तीन राज्य थे। झेलम नदी के चारों ओर राजा अम्भि का शासन था। पोरस का राज्य चेनाब नदी से लगे हुए क्षेत्रों पर था। तीसरा राज्य अभिसार था, जो कश्मीरी क्षेत्र में था।

अम्भि की पोरस से शत्रुता थी, इसलिए सिकन्दर के आगमन को अम्भि ने अपनी शत्रुता निकालने का उपयुक्त अवसर समझा। अभिसार की सेना ने उदासीन रवैया अपना लिया और इस तरह पोरस ने अकेले ही सिकन्दर तथा अम्भि की मिली-जुली सेना का सामना किया।

प्रख्यात पश्चिमी इतिहासकार ई.ए. डब्ल्यू. बैज के अनुसारः

“झेलम के युद्ध में सिकन्दर की अश्व-सेना का अधिकांश भाग नेस्तनाबूत हो गया। सिकन्दर ने अनुभव कर लिया कि यदि अब लड़ाई जारी रखी जाएगी तो उसका नाश हो जाएगा। अतः सिकन्दर ने पोरस से शांति की प्रार्थना की। सिकन्दर ने पोरस की वीरता और सामर्थ्य को स्वीकार कर लिया। हालांकि, भारतीय परम्परा के अनुसार ही पोरस ने शरणागत शत्रु का वध नहीं किया।”

यूनानी इतिहासकारों ने भी स्वीकारी है सिकन्दर की हार


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यूरोप को मानवीय सभ्यता के जनक के रूप में स्थापित करने वाले पश्चिमी इतिहासकारों की राय सिकन्दर के भारत अभियान को लेकर काफी विरोधाभाषी रही है।

एक तरफ वे उसे विजेता भी घोषित करते हैं, दूसरी ओर वे सम्राट पोरस की भयावह सेना द्वारा यूनानी सैनिकों को नष्ट करने का भी वर्णन करते हैं। और अंत में ये साबित करने का प्रयास करते हैं कि सिकन्दर ने जान-बूझकर भारत में प्रवेश नहीं किया और वहीं से लौट गया।

इतिहासकार डियोडरस लिखते हैंः

“पोरस के विशाल हाथियों में अपार बल था और वे युद्ध में अत्यन्त लाभकारी सिद्ध हुए। उन्होंने अपने पैरों तले बहुत सारे यूनानी सैनिकों की हड्डी-पसली चूर-चूर कर दी। हाथी इन सैनिकों को अपनी सूँड़ों से पकड़ लेते थे और जमीन पर जोर से पटक देते थे। और अपने विकराल गज-दन्तों से सिकंदर के सैनिकों को गोद-गोद कर मार डालते थे।”

वहीं, कर्टियस का कहना हैः

“पोरस के हाथियों की तुर्यवादक ध्वनि से होने वाली भीषण चीत्कार न केवल सिकन्दर के घोड़ों को भयातुर कर देती थी, जिससे वे बिगड़कर भाग उठते थे। इन पशुओं ने ऐसी भगदड़ मचाई कि ‘विश्वविजयी’ कहलाने वाले अलेक्जेंडर के योद्धा शरण के लिए जगह खोजने लग गए थे। उन पशुओं ने कईयों को अपने पैरों तले रौंद डाला और सबसे हृदयविदारक दृश्य वो होता था जब ये स्थूल-चर्म पशु अपनी सूँड़ से यूनानी सैनिक को पकड़ कर चारों और बुरी तरह घुमा-घुमाकर अपने आरोही के हाथों सौंप देता था। जो तुरन्त उसका सर धड़ से अलग कर देता था।”



यूनानी दार्शनिक और इतिहासकार प्लूटार्च का कहना हैः

“सिकन्दर के बीस हजार पैदल सैनिक तथा पन्द्रह हजार अश्व सैनिक पोरस की युद्ध क्षेत्र में एकत्र की गई सेना से कई गुना अधिक थी। सिकन्दर की सहायता ईरानी सैनिकों ने भी की। इस युद्ध के शुरू होते ही पोरस ने अपने सैनिकों को ‘भयंकर रक्त-पात’ का आदेश दे दिया । उसके बाद पोरस के सैनिकों तथा हाथियों ने रणक्षेत्र में ऐसा तांडव मचाया कि सिकन्दर तथा उसके सैनिकों के सर पर चढ़े विश्वविजेता बनने का भूत उतर गया।”

प्लूटार्च आगे लिखते हैंः

“मलावी नामक भारतीय जनजाति बहुत खूंखार थी। इनके हाथों सिकन्दर के टुकड़े-टुकड़े होने वाले थे, लेकिन तब तक प्यूसेस्तस और लिम्नेयस आगे आ गए। इसमें से एक तो मार ही डाला गया और दूसरा गम्भीर रूप से घायल हो गया। बाद में सिकन्दर के अंगरक्षक उसे सुरक्षित स्थान पर ले गए।”

ये बातें स्वयं यूनानियों ने कही हैं। विचार करिए कि डियोडरस का ये कहना कि उन हाथियों में अपार बल था और वे अत्यन्त लाभकारी सिद्ध हुए। प्लूटार्च द्वारा पोरस की छोटी सेना का परिमित पराक्रम तथा “कर्टियस” द्वारा कहना कि इन पशुओं ने आतंक मचा दिया था क्या सिद्ध कर रहा है।

सिकन्दर अपना राज्य उसे क्या देता, बल्कि वह तो पोरस को भारत के जीते हुए प्रदेश उसे लौटाने के लिए विवश था। इसके बाद पोरस ने सिकंदर को उत्तर मार्ग से जाने की अनुमति नहीं दी। विवश होकर सिकन्दर को उस खूंखार जन-जाति के कबीले वाले रास्ते से जाना पड़ा, जिससे होकर जाते-जाते सिकन्दर इतना घायल हो गया कि अंत में उसे प्राण ही त्यागने पड़े।

ऊपर इसका स्पष्टीकरण भी यूनानी इतिहासकार प्लूटार्च ने ही अपने अभिलेखों में दिया है।

भारतीय इतिहास लेखन में भी छुपाया गया सच

जाने कितने दिनों से हम अपने बच्चों को इतिहास की पुस्तकों में ये झूठ पढ़ाते आ रहे हैं:

“सिकन्दर ने पोरस को बंदी बना लिया था। उसके बाद जब सिकन्दर ने उससे पूछा कि उसके साथ कैसा व्यवहार किया जाए, तो पोरस ने कहा कि उसके साथ वही किया जाए जो एक राजा के साथ किया जाता है अर्थात मृत्यु-दण्ड। सिकन्दर इस बात से इतना अधिक प्रभावित हो गया कि उसने वह कार्य कर दिया जो अपने जीवन काल में कभी नहीं किए थे। उसने अपने जीवन के एक मात्र ध्येय, अपना सबसे बड़ा सपना विश्व-विजेता बनने का सपना तोड़ दिया और पोरस को पुरस्कार-स्वरूप अपने जीते हुए कुछ राज्य तथा धन-सम्पत्ति प्रदान किए। इसके साथ ही उसने वापस लौटने का निश्चय किया और लौटने के क्रम में ही उसकी मृत्यु हो गई।”

पोरस को महान क्यों नहीं कहता ‘भारतीय इतिहास’?

आश्चर्य है कि हमारे इतिहासकारों ने कैसे पश्चिम के ‘इतिहासकारों’ के पक्षपातपूर्ण लेखन को स्वीकार लिया। क्या ये हमारे मुंह पर तमाचा नहीं है कि ग्रीक फिल्मकार और इतिहासकार ‘सिकंदर’ की हार को स्वीकार रहे हैं और हम उसे ‘महान’ विश्वविजेता कहते हैं?

यूनानी इतिहासकारों के पक्षपाती होने की बात समझी जा सकती है, पर भारतीय इतिहासकारों द्वारा सिकन्दर को इतना महिमामंडित किया जाना, क्या हमारी मानसिक गुलामी को साबित नहीं करता है?

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सिकन्दर को सिर्फ विश्वविजेता ही नहीं, बल्कि महान की उपाधि भी प्रदान की गई है और यह बताया जाता है कि सिकन्दर बहुत बड़ा हृदय वाला दयालु राजा था, ताकि उसे महान घोषित किया जा सके, क्योंकि सिर्फ लड़ कर लाखों लोगों का खून बहाकर एक विश्व-विजेता को “महान” की उपाधि नहीं दी जा सकती। उसके अंदर मानवता के गुण भी होने चाहिए। इसलिए ये भी घोषित कर दिया गया कि सिकन्दर विशाल हृदय वाला एक महान व्यक्ति था।

पर उसे महान घोषित करने के पीछे एक बहुत बड़ा उद्देश्य छुपा हुआ है और वह उद्देश्य है सिकन्दर की पोरस पर विजय को सिद्ध करना। क्योंकि यहां पर सिकन्दर की पोरस पर विजय को तभी सिद्ध किया जा सकता है, जब यह सिद्ध हो जाए कि सिकन्दर विशाल हृदय वाला महान शासक था।

‘जो जीता वही सिकन्दर’ जैसे मुहावरों का प्रयोग हम सदियों से ‘महान’ विजेता के लिए करते आ रहे हैं। एक ऐसा विजेता जो इतनी भारी सेना के साथ के बावजूद एक छोटे से राज्य से बुरी तरह हार गया, जबकि महान वास्तव में सम्राट पुरु थे, जिन्होंने हारे हुए आक्रांता को ‘अभयदान’ प्रदान करते हुए जाने का मौक़ा दिया। इतिहासकारों ने सम्राट पोरस को महान तो कहना दूर उसे लगभग विस्मृत करते हुए, सिकन्दर के सामने एक हारे हुए योद्धा के रूप में दर्शा दिया।

क्या ये हमारे लिए शर्म की बात नहीं है कि हमने एक महान नीतिज्ञ, दूरदर्शी, शक्तिशाली वीर विजयी राजा पोरस को जबरदस्ती निर्बल और पराजित राजा के रूप में स्वीकार लिया!

स्पष्ट है कि पोरस के साथ युद्ध में सिकन्दर की सेना का मनोबल बुरी तरह टूट चुका था। फिर रही-सही कसर जनजातियों ने पूरी कर दी थी। स्थल मार्ग के खतरे को देखते हुए सिकन्दर ने समुद्र मार्ग से जाने का विचार किया और अपने सैनिकों की कुछ टुकड़ियों को भेजने का आदेश भी दिया पर युद्ध में हारे-पिटे सैनिकों में इतना भी उत्साह शेष नहीं बचा था कि वे बगैर पूरी सेना के यात्रा कर सकें।

अंततः वे बलुचिस्तान के रास्ते ही वापस लौट सके। इस तरह तथाकथित ‘विश्वविजेता’ का घमंड भारत में चूर-चूर हो गया। आज भी झेलम के तट की लहरों से आवाज आती हैः


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“यूनान का सिकंदर झेलम तट पे हारा”

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