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कैंपस पॉलिटिक्स ने एक छात्र को आत्महत्या करने पर कर दिया मजबूर, लिबरल मीडिया ने साध रखी है चुप्पी

Published on 15 January, 2017 at 7:27 pm By

वह बस 21 साल का था, लेकिन अभिषेक, रोहित वेमुला नहीं था। अगर वह रोहित होता, तो अभी मुख्यधारा की मीडिया और खुद को उदारवाद और धर्मनिरपेक्षता का चैम्पियन समझने वाले सभी लोगों की आवाज आपको सुनाई पड़ती।


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जिन परिस्थितियों में रोहित वेमुला ने बड़ा कदम उठाया था, लगभग वैसी ही परिस्थितियों में अभिषेक ने भी अपनी जिंदगी को खत्म कर लिया। अभिषेक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) का सदस्य था। वह कर्नाटक के श्रृंगेरी में श्री जेसीबीएम कॉलेज के बीकॉम फाइनल ईयर का छात्र था।

abhishek

7 जनवरी को ABVP ने कॉलेज में ‘योद्धा नमन’ नाम से एक कार्यक्रम का आयोजन करने का फैसला किया था। संगठन ने कई जाने-माने लेखकों और कॉलमनिस्ट चक्रवर्ती को इस कार्यक्रम में आमंत्रित किया था।

कांग्रेस समर्थित भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (NSUI) ने इस कार्यक्रम पर अपनी आपत्ति जताई और कॉलेज के प्रिंसिपल को कानून एवं व्यवस्था का हवाला देते हुए, कॉलमनिस्ट चक्रवर्ती को दिया गया निमंत्रण नामंजूर करने के लिए मजबूर किया। आपको बता दें कि कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है।

बाद में इस कार्यक्रम को लेकर कथित तौर पर ABVP और NSUI के छात्रों के बीच झड़प हुई। जिसके बाद NSUI ने अभिषेक सहित कई ABVP के सदस्य छात्रों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करा दी।

पुलिस सूत्र के हवाले से बैंगलोर मिरर ने लिखा हैः

“FIR दर्ज होने की घटना ने अभिषेक को पूरी तरह से हिला दिया और वह परेशान था। अपने सुसाइड नोट में उसने अपने पिता से माफ़ी मांगते हुए कहा कि उसे बिना किसी गलती के दोषी ठहराया जा रहा है। अगर वह वास्तव में झड़प में शामिल होता, तो वह कभी इतना बड़ा कदम नहीं उठाता। चूंकि उसका नाम FIR में शामिल था, तो उसे अपना भविष्य दांव पर लग रहा था।”

अगर किसी भी छात्र के खिलाफ FIR दर्ज की जाए, तो यकीनन कोई भी छात्र तनाव में जा सकता है।


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वहीं, द हिन्दू की एक रिपोर्ट कहती है कि ‘आरोपी’ को तलब या कभी पूछताछ के लिए नहीं बुलाया गया था।



abhishek

इस घटना से आहत अभिषेक के पिता ने अभिषेक के खिलाफ झूठी FIR दर्ज कराने के लिए NSUI के अध्यक्ष और अन्य लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। वह अपने बेटे की मौत के लिए कॉलेज प्रबंधन को दोषी मानते हैं।

इस बीच, अभिषेक को न्याय दिलाने के उद्देश्य से ABVP द्वारा ‘जस्टिस फॉर अभिषेक’ अभियान शुरू किया गया है।

यहां तक कि कॉलमनिस्ट चक्रवर्ती ने भी इस अभियान के समर्थन में ट्वीट किया।

अभिषेक को इन्साफ दिलाने के लिए छात्र विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

लेकिन सबसे हैरानी की बात है कि इस आत्महत्या को लेकर देशभर में कोई हाय-तौबा नहीं मची। समाचार चैनलों में कोई बहस या अखबारों के पहले पन्ने पर इस घटना का जिक्र तक नहीं हुआ। रोहित वेमुला की मौत पर ‘महान श्रेणी’ के पत्रकारों ने जाति कार्ड खेलने से भी गुरेज नही किया। कुछ पैसे कमाने के लिए और अपने राजनीतिक संबंधों को मजबूत करने के लिए, उन पत्रकारों ने वेमुला की मौत का राजनीतिकरण कर दिया। रोहित वेमुला के समय प्राइम टाइम पर खबरें चलाने वाले आज आंखों में पट्टी बांध, कानों में रुई डालकर चुप बैठे हुए हैं।


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आज अभिषेक की मौत पर बड़ी संख्या में पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की चुप्पी उनकी कलई खोलती है, उन्हें बेनकाब करती है।

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