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परमवीर अब्दुल हमीद ने जब अकेले मार गिराए थे 7 पाकिस्तानी टैंक; सरपट भाग गया था मुशर्रफ़

Updated on 10 September, 2017 at 8:49 am By

“अब्दुल हमीद और दुश्मन के टैंक दोनों ही अपनी जगहों से एक-दूसरे पर गोलाबारी कर रहे हैं। दोनों के गोले अपने लक्ष्यों को भेद रहे थे। तभी वहां सिर्फ़ एक तेज़ आवाज़ के धमाके के साथ आग और धुआं रह गया। अब्दुल हमीद शहीद हो चुके हैं। इससे पहले उन्होंने दुश्मन के सात टैंकों के परखच्चे उड़ा दिए।”

रचना बिष्ट रावत अपनी किताब “1965: स्टोरीस फ्रॉम दी सेकेंड इंडो-पाक वॉर” से अब्दुल हमीद की अतुलनीय साहस को सलाम करती हैं, तो पूरा हिन्दुस्तान उनकी शहादत पर भावुक हो जाता है।


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तो आइए भारत के सच्चे सपूत अब्दुल हमीद को नमन करते हुए उनकी साहस और अतुलनीय बहादुरी की वह गाथा जानने की कोशिश करते हैं कि आख़िर उन्होंने ऐसा क्या किया कि परवेज़ मुशर्रफ़ और उसकी सेना को पीठ दिखा कर भागना पड़ा।

क्या आप जानते हैं कि वीर अब्दुल हमीद के फौलादी हौसले से प्रेरित होकर नसीरुद्दीन शाह ने दूरदर्शन के धारावाहिक परमवीर चक्र में हवलदार अब्दुल हमीद की भूमिका निभाई थी?

कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद अपनी बंदूक से युक्त जीप की सह-चालक सीट पर सवार होकर गन्ने के खेतों से गुज़र रहे थे। खेतों के आस-पास हो रही हलचल और हवाओं में हो रही सरसराहट वो साफ तौर पर सुन सकते थे।

जीप चीमा गांव के पास एक कीचड़ वाले रास्ते से होकर गुज़र रही थी। वह जान चुके थे कि पाकिस्तान की बलशाली पैटन टैंक, रेजिमेंट पर हमला करने की साज़िश रच चुकी है। पाकिस्तानी पैटन टैंकों की गड़गड़ाहट की आवाज़ तेज़ होती जा रही थी।

पाकिस्तानी पैटन टैंक भारतीय दिशा में नापाक इरादों के साथ बढ़ रहे थे, लेकिन ये पाकिस्तानियों के लिए बिल्कुल भी आसान नहीं होने वाला था, क्योंकि उनके राह में फौलाद की तरह डटे हुए थे, अब्दुल हमीद।

इस युद्ध में पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख और राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ भी अहम भूमिका निभा रहे थे। वह उस समय नवयुवक थे पाकिस्तानी सेना के मोर्चे की कमान उनके हाथ में ही थी।

हमीद और उनके साथी ने अपने हथियारों को संभाल लिया। दोनों दुश्मन को चेतावनी देने के मूड में नहीं थे। जैसे ही टैंक करीब आया, दोनों ने इसके कमज़ोर हिस्सों पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दी। और देखते ही देखते टैंक के परखच्चे उड़ गए। दोनों ही ‘शाबाश’ कहते हुए झूम उठे। फिर दूसरे टैंक को ठिकाने लगाने के लिए चल पड़े।

युद्ध और विजय गाथा की कहानी



वीर अब्दुल हमीद का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में 1 जुलाई 1933 में एक साधारण दर्जी परिवार में हुआ था। वह भारतीय सेना की 4 ग्रेनेडियर में सिपाही थे। 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान खेमकरण सेक्टर के आसल उत्ताड़ में लड़े गए युद्ध में उन्होंने अद्भुत वीरता और साहस का प्रदर्शन किया था। उन्हें मरणोपरान्त भारत का सर्वोच्च सेना पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

7 सितम्बर-1965 की रात को पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया। हमले का मुंहतोड़ जवाव देने के लिए भारतीय सेना के जवान फौलाद बन कर सामने खड़े हो गए। हालत समझने और रणनीति बनाने का बिल्कुल भी समय नहीं था। ऐसी हालत में वीर अब्दुल हमीद ने पंजाब के तरन तारन जिले के खेमकरण सेक्टर में मुट्ठी भर सेना के साथ अग्रिम पंक्ति में मोर्चा संभाला। पाकिस्तानियों ने अजेय माने जाने वाले “अमेरिकन पैटन टैंकों” के साथ हमला किया था।

भारतीय सैनिकों के पास न तो टैंक थे और न ही बड़े हथियार, लेकिन उनके पास था मजबूत इरादों के साथ भारत माता की रक्षा के लिए लड़ते हुए मर जाने का हौसला। भारतीय सैनिक अपनी साधारण “थ्री नॉट थ्री रायफल” और एलएमजी के साथ पैटन टैंकों का सामना करने लगे। हवलदार वीर अब्दुल हमीद के पास “गन माउनटेड जीप” थी, जो पैटन टैंकों के सामने एक खिलौने के समान थी।

अब्दुल हमीद ने अपनी जीप में बैठ कर अपनी गन से पैटन टैंकों के कमजोर हिस्सों पर एकदम सटीक निशाना लगाकर एक-एक कर धवस्त करना प्रारम्भ कर दिया। उनको ऐसा करते देख अन्य सैनिकों का भी हौसला बढ़ गया और देखते ही देखते पाकिस्तानी फ़ौज में भगदड़ मच गई। वीर अब्दुल हमीद ने अपनी “गन माउन्टेड जीप” से सात पाकिस्तानी पैटन टैंकों को नष्ट किया था।

देखते ही देखते यह स्थान पाकिस्तानी पैटन टैंकों की कब्रगाह बन गया, लेकिन अब्दुल हमीद का गुस्सा अभी शांत नही हुआ था। भागते हुए पाकिस्तानियों को वह साफ तौर पर भारत माता की तरफ से यह संदेश देना चाहते थे कि यहां की पवित्र भूमि पर नापाक कदम रखने का अंज़ाम क्या होता है। वह भागते हुए पाकिस्तानियों को ललकारते रहे।

पाकिस्तानियों को खदेड़ रहे “वीर अब्दुल हमीद” की जीप पर एक गोला गिर जाने से वह बुरी तरह से घायल हो गए और अगले दिन 9 सितम्बर को उनका स्वर्गवास हो गया, लेकिन उनके वीरगति प्राप्त होने की आधिकारिक घोषणा 10 सितम्बर को की गई थी।


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इस युद्ध में साधारण “गन माउन्टेड जीप” के हाथों पैटन टैंकों की पराजय को देखते हुए अमेरिका को इसके डिजाइन को लेकर पुनः समीक्षा करनी पड़ी थी। यह अलग बात है कि अमेरिकी “गन माउन्टेड जीप” को लेकर समीक्षा कर रहे थे, उसे चलाने वाले वीर अब्दुल हमीद के हौसले को नहीं देख पा रहे थे।

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