5000 वर्ष से भी अधिक पुराने इस मंदिर में रखा है 200 ग्राम वजनी गेहूँ का दाना

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Updated on 19 Feb, 2016 at 4:12 pm

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पौराणिक साहित्यों में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के आसपास के क्षेत्र को ‘देवभूमि’ माना जाता है। हिमाचल में हर 10-20 किलोमीटर के अंतराल में कोई न कोई प्राचीन मंदिर अवश्य दिखाई पड़ जाएगा।

आपको ये जानकर हैरानी होगी कि हिमाचल के ही एक गांव में महाभारत-कालीन भगवान महादेव का एक मंदिर है। कहा जाता है कि यह मंदिर करीब 5000 वर्ष से भी अधिक पुराना है। यह शिव मंदिर करसोगा घाटी के एक छोटे से ममेल नामक गांव में स्थित है। इसलिए मंदिर को ‘ममलेश्वर महादेव’ मंदिर के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर में भक्तों की सभी मुरादें पूरी हो जाती हैं।

मंदिर में रखा है 200 ग्राम वजनी गेहूँ का दाना

आपको पढ़कर आश्चर्य हुआ होगा कि पाव भर वजन का भी गेहूँ का दाना हो सकता है भला! जी हां, 200 ग्राम वजनी गेहूँ का दाना ममलेश्वर महादेव मंदिर में रखा हुआ है। यह गेंहूँ का दाना हमेशा पुजारी के संरक्षण में रहता है, जो मंदिर के भीतर ही सीसे के एक पारदर्शी बॉक्स के अन्दर रखा हुआ है। इसे भी पांडवों के काल-खंड का समझा जाता है।

स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक़ पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय इसी स्थान पर बिताया था। माना जाता है कि उस काल में गेहूँ एवं अन्य खाद्य सामग्रियों के आकार आज की तुलना में काफी बड़े होते थे।


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भगवान शिव और माता पार्वती के युगल स्वरूप की है दुर्लभ प्रतिमा

ममलेश्वर महादेव मंदिर विश्व का इकलौता ऐसा मंदिर हैं, जहाँ पर भगवान भोलेनाथ और माता गौरा पार्वती की युगल मूर्ति स्थापित हैं। मंदिर परिसर में पांच शिवलिंग विराजमान हैं, जिनके बारे में जनश्रुति है कि इनकी स्थापना भी पांडव काल में स्वयं पांचों पांडव भाइयों के द्वारा ही की गई थी। देश का यह अभूतपूर्व मंदिर प्राचीनता और दिव्यता के दर्शन के साथ-साथ महाभारत काल के तमाम सबूतों को अकेले ही समेटे हुए है। भारतीय पुरातत्व विभाग भी इस मंदिर की अति प्राचीनता को स्वीकारता है।

यहीं भीम ने किया था ‘बकासुर’ का वध

महाभारत में एक भीम द्वारा बकासुर नामक राक्षस को मारे जाने का प्रसंग आता है। उस समय इस क्षेत्र को ‘एकचक्रा’ नगरी कहा जाता था। अपने अज्ञातवास के दौरान भगवान वेदव्यास के निर्देश पर पांचों पांडव अपनी माता कुंती के साथ एकचक्रा नगरी के अपनी पहचान छुपाते हुए ब्राह्मण का वेश धरकर एक ब्राह्मण दपंति के घर में अतिथि के रूप में रहने लगे।

इस गांव में ‘बक’ नामक एक राक्षस आतंक मचाये हुए था। राक्षस के प्रकोप से बचने के लिए लोगों ने उसके साथ एक समझौता किया था कि प्रतिदिन उसके पास एक व्यक्ति उसका भोजन लेकर जाया करेगा। इस तरह रोज ही कोई न कोई व्यक्ति उसका भोजन लेकर जाता था और राक्षस भोजन के साथ उसे भी मार कर खा लेता था। एक दिन उसी घर के लड़के की बारी आई, जिसमें पांडव रुके हुए थे। तब कुंती ने तय किया कि महाबली भीम राक्षस के पास भोजन ले कर जाएंगे। भीम और बक के मध्य भयंकर युद्ध हुआ और भीम ने उस राक्षस को मारकर गांव को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाई।

5000 सालों से मंदिर में जल रही है अखंड धूनी

बकासुर को मारने के बाद भीम सहित सभी पांडव पहचान उजागर होने की आशंका से गांव छोड़ कर चले गए। गांव वालों ने अपने त्राशहर्ता भीम की महान विजय का जश्न इसी मंदिर में मनाया और एक धूनी जलाई जो पिछले पांच हजार सालों से अनवरत जल रही है।

सबसे रोचक बात यह है कि इस धूनी में किसी भी प्रकार की कोई लकड़ी या फिर अन्य चीज नहीं लगाई जाती हैं, इसके बावजूद यह लगातार 5000 सालों से लगतार जल रही हैं। मंदिर के ही प्रांगण में भीमसेन की ढोल टंगी हुई है। कहा जाता है कि यह ढोल भी महाबली भीम सेन के द्वारा ही बजाई जाती थी।

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