ये हैं 12 बेतुके आरटीआई आवेदन जिन्हें दर्ज करना जरूरी नहीं था

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Updated on 12 Sep, 2015 at 7:23 pm

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सूचना के अधिकार (आरटीआई) का मूल उद्देश्य नागरिकों को शक्ति प्रदान करना, सरकारी काम-काज में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देना है। भारत सरकार का मानना है कि आरटीआई की वजह से यह सुचारू रूप से काम नहीं कर सकती है। इसे यदा-कदा बाधा पहुंचती रहेगी। इसलिए सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया कि केन्द्र सरकार को आरटीआई के दायरे से बाहर रखा जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा है कि राजनीतिक दल जन-प्राधिकारी नहीं है, इसलिए इन्हें आरटीआई के दायरे में नहीं रखा जा सकता।

यह जानकारी उस आवेदन बाद उपलब्ध हुईं थी, जिसे एक गैर-सरकारी संगठन ने राजनीतिक दलों को जन-प्राधिकारी घोषित करने और सूचना के अधिकार के दायरे में लाने के लिए दर्ज किया था। इन्टरनेट के आधुनिक दौर में जब एक व्यक्ति को सोशल मीडिया के किसी पोस्ट के लिए जेल भेजा जा सकता है, उसी दौर में यह अटपटा लगता है कि राजनीतिक दल खुद को पर्दे में रखना चाहते हैं। यही नहीं उन्हें बाकी सभी सिस्टम पारदर्शी चाहिए।

सूचना का अधिकार एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, जहां आवेदन दायर कर किसी भी जन-अधिकारी से किसी भी तरह की सूचना हासिल की जा सकती है। हम यहां कुछ उन आरटीआई आवेदनों की चर्चा करेंगे, जो निहायत ही मूर्खतापूर्ण और बेतुके हैं।

1. वर्ष 2010 में सूचना के अधिकार के तहत एक आवेदन दर्ज किया गया था, जिसमें एमसीडी अधिकारियों के तम्बाकू खाने की आदतों के बारे में पूछा गया था।

ओह अब पता चला। ये तम्बाकू आखिर जाते कहां हैं?

2. वर्ष 2014 में एक एक्टिविस्ट ने चुनाव आयोग से पूछा था कि वोटिंग मशीन के बटन ब्लैक एंड व्हाईट में ही क्यों होते हैं। ये रंगीन क्यों नहीं होते।

अरे, भैय्या। आपको ब्लैक एंड व्हाईट दिखाई नहीं देता क्या?

3. प्रधानमंत्री कार्यालय को एक व्यक्ति ने आवेदन दायर कर पूछा है कि अच्छे दिन क्या सच में आ गए हैं।

भाई साहब। हम सभी अच्छे दिनों का इन्तजार कर रहे हैं। कर रहे हैं कि नहीं।

4. वर्ष 2008 में उत्तर प्रदेश की एक लड़की ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से पूछा था कि रक्षा बंधन के अवसर पर उसने जॉर्ज बुश को जो लड्डू भेजी थी, वह उन्हें नहीं मिली। आवेदनकर्ता लड़की ने आयोग से सिफारिश की थी कि इस मामले पर संज्ञान लिया जाए और उचित कार्रवाई की जाए।

भैय्या मेरे, राखी के बंधन को निभाना। अपनी बहन के भेजे लड्डू को बचाना।

5. अक्टूबर 2009 में एक सज्जन ने आवासीय परिसरों में लगाए गए पंखों और ट्यूब-लाईट की संख्या के बारे में जानने के लिए आवेदन किया था।


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लगता है कि यह सज्जन दुनिया के सबसे बड़े ट्यूब-लाईट हैं।

6. पंजाब विश्वविद्यालय को मिले एक आरटीआई आवेदन में पूछा गया था कि रामायण और महाभारत जैसे धर्मग्रन्थों के मुताबिक आज समय की क्या कीमत है।

मैं समय हूं। यह प्रसिद्ध डायलॉग आप सबको तो याद ही होगा। है कि नहीं?

7. एक 9 साल के बच्चे ने आरटीआई के माध्यम से पूछा कि उसके साइकिल खोने पर एफआईआर क्यों नहीं दर्ज हो सकता।

मुझे पुलिस अंकल पर तरस आ रहा है।

8. एक सज्जन तो इतने महान हुए कि उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत यह पूछ डाला कि प्रधानमंत्री के समक्ष जाने से पहले उन्हें किस तरह का अंडरवीयर पहनना चाहिए।

भाई, ये अन्दर की बात है। सार्वजनिक मत करिए। इज्जत बची रहेगी।

9. डियोडरेन्ट लगा कर लड़की का इन्तजार कर रहे एक युवक ने आरटीआई दायर किया कि उसने AXE डियो का इस्तेमाल कर घंटों इन्तजार किया। लेकिन एक भी लड़की खिंची नहीं आई।

अब कोई इस बालक को बताओ कि उसे डियोडरेन्ट की नहीं, कॉन्फीडेन्स की जरूरत है।

10. मई 2010 में हैदराबाद के एक व्यक्ति ने यह जानने के लिए आरटीआई आवेदन दाखिल किया कि आन्ध्र प्रदेश के राज्यपाल दिन में कितनी बार मंदिर जाते हैं।

इसमें गलत क्या है भाई। वह मंदिर एक बार जाएं या सौ बार। राज्यपालों के पास वैसे भी क्या काम होता है।

11. नागपुर के एक वकील ने आरटीआई के माध्यम से यह जानने की कोशिश की कि अभिनेत्री काजोल सांवली होने के बावजूद फेयरनेस क्रीम का विज्ञापन कैसे कर रही हैं।

वकील साहब, आपको कोई ढंग का केस नहीं मिल रहा है क्या।

12. एक बुजुर्ग गुजराती सज्जन ने सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए तमिल नाडु सरकार से पूछा कि उन्हें आधिकारिक लाईफ पार्टनर उपलब्ध हो सकता है या नहीं।

चचा, आप दिग्विजय सिंह से मिलिए। आपकी समस्या का समाधान वह बेहतर कर सकते हैं। अगर नहीं, तो शादी.कॉम जिन्दाबाद।

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